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अये दीन-ए-हक़ के रहबर ! तुम पर सलाम हर दम

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अये दीन-ए-हक़ के रहबर ! तुम पर सलाम हर दम

अये दीन-ए-हक़ के रहबर ! तुम पर सलाम हर दम
मेरे शफी'-ए-महशर ! तुम पर सलाम हर दम
 
इस बे-कस-ओ-ख़ज़ी पर , जो कुछ गुज़र रही है
ज़ाहिर है सब वो तुम पर, तुम पर सलाम हर दम
 
बंदा तुम्हारे दर का , आफत में मुब्तला है
रहम अये हबीब-ए-दावर ! तुम पर सलाम हर दम
 
लिल्लाह ! अब हमारी , फ़रियाद को पहुंचिए
बे-हद है हाल अब्तर, तुम पर सलाम हर दम
 
कोई नहीं है मेरा, मैं किस से दाद चाहूँ
सुलतान-ए-बंदा-परवर , तुम पर सलाम हर दम
 
बुलवा के अपने दर पर , अब मुझको दीजिये 'इज़्ज़त
फिरता हूँ ख़ाक दर-दर , तुम पर सलाम हर दम
 
मोहताज से तुम्हारे करते हैं सब किनारा
बस एक तुम्ही हो यावर तुम पर सलाम हर दम
 
कोई नहीं हमारा , हम किसके दर पे जाएं
अये बे-कसों के यावर ! तुम पर सलाम हर दम
 
अपने गदा-ए-दर की , लीजिये ख़बर ख़ुदारा
कीजिये करम हसन पर , तुम पर सलाम हर दम
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Mohammad Wasim

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