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ऐ शहंशाहे मदीना अस्सलातो वस्सलाम,

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ऐ शहंशाहे मदीना अस्सलातो वस्सलाम,

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ऐ शहंशाहे मदीना अस्सलातो वस्सलाम,

ज़ीनत ए अर्शे मो’अल्ला अस्सलातो वस्सलाम।

रब्बे हबली उम्मती कहते हुए पैदा हुए,
हक़ ने फ़रमाया के बख्शा अस्सलातो वस्सलाम ।


दस्त बस्ता सब फ़रिश्ते पढ़ते हैं उन पर दुरुद,
क्यों न हो फिर विर्द अपना अस्सलातो वस्सलाम ।


मोमिनों पढ़ते रहो तुम अपने आक़ा पर दुरूद,
है फरिश्तों का वजीफा अस्सलातो वस्सलाम।


बुत शिकन आया ये कह कर सर के बल बुत गिर पड़े,
झूम कर कहता था काबा अस्सलातो वस्सलाम ।


सर झुका कर ब अदब इश्के रसूलल्लाह (ﷺ) में,
कह रहा है हर सितारा अस्सलातो वस्सलाम ।


गुंचे चटके, फूल महके, चहचहाए बुलबुलें,
गुल खिला बागे अहद का अस्सलातो वस्सलाम ।


हज़रत ए आदम से ले कर हज़रत ए ईसा तलक,
सारे नबियों से पढ़ा है अस्सलातो वस्सलाम।


आमना ने रौशनी में जिनके देखा मुल्के शाम,
वाह वाह क्या चांद निकला अस्सलातो वस्सलाम ।


देव के बंदे वहबडे जलते हैं जलते रहें,
अहले सुन्नत का वजीफा अस्सलातो वस्सलाम ।


सर कलम कर दो मेरा या काट दो मेरी ज़बान,
मेरा नस नस भी पढ़ेगा अस्सलातो वस्सलाम ।


मैं वो सुन्नी हूं जमील ए क़ादरी मरने के बाद,
मेरा लाशा भी पढ़ेगा अस्सलातो वस्सलाम।।।

 

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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