आशूरा का रोज़ा
۞ हदीस: अब्दुल्लाह बिन अब्बास (र.अ.) से रिवायत है कि, जब अल्लाह के रसूल (ﷺ) ने आशूरा के दिन 10 मुहर्रम का रोज़ा रखा और हुक्म (आदेश) दिया इस रोज़े का, तो लोगों ने अर्ज़ किया, या रसूलअल्लाह (ﷺ)! यह दिन तो ऐसा है कि इसकी ताज़िम यहूद और नसारा करते हैं।
तो आप (ﷺ) ने फरमाया कि जब अगला साल आएगा तो इंशा अल्लाह हम 9 का रोज़ा रखेंगे।
आखिर अगला साल ना आने पाया कि आप (ﷺ) इस दुनिया से रुखसत कर गए। (इसलिए हम मुसलमान 9 और 10 दोनों का रोज़ा रखते हैं)।
📕 सहीह मुस्लिम, वॉल्यूम 3, 2666
आशूरा के रोज़े की फज़ीलत:
۞ हदीस: अबू कतादा अल-अंसारी (र.अ.) से रिवायत है कि, रसूलअल्लाह (ﷺ) से आशूरा (10 मुहर्रम) के दिन के रोज़े के बारे में पूछा तो आप (ﷺ) ने फरमाया –
'यह गुज़रे हुए साल के गुनाहों का कफ्फारा है।'
📕 सहीह मुस्लिम, वॉल्यूम 3, 2747
यहूदी आशूरा का रोज़ा क्यों रखते थे?
10 मुहर्रम को अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा (अलैहि सलाम) की उम्मत को फिरऔन की क़ैद से आज़ाद करवाया और फिरऔन को पानी में ग़रक कर दिया था।
लिहाज़ा इसके शुक्राने के तौर पर मूसा (अलैहि सलाम) की उम्मत यह आशूरा का रोज़ा रखती थी, और उम्मत-ए-मोहम्मदिया को 9 और 10 या फिर 10 और 11 का रोज़ा रखना है ताकि यहूद और नसारा से मुसाबाहत ना हो और उनकी मुखालिफत हो।
उलमा उनकी मुखालिफत के तअल्लुक से कहते हैं कि उनकी मुखालिफत का हुक्म इसलिए क्योंकि वह क़ौम भी ऐज़ाज़ पाने के बाद अल्लाह और उसके नबियों के हुक्म की मुखालिफत करने लग गई थी। लिहाज़ा उनकी मुखालिफत में हमें एक के बजाय 2 रोज़े रखने का हुक्म मिला।
नोट: 9 और 10 या फिर 10 और 11 का रोज़ा रख सकते हैं।
अल्लाह तआला हमें कहने सुनने से ज्यादा अमल की तौफीक अता फरमाए। आमीन
Muharram Mein Muravvijah Taziyadare ka Masala / मुहर्रम में मुरव्विजह ताज़ियादारी का मसला
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