ताजदार-ए-हरम, ऐ शहंशाह-ए-दीं !
तुम पे हर दम करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम
हो करम मुझ पे, या सय्यिदल-मुरसलीं !
तुम पे हर दम करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम
दूर रह कर न दम टूट जाए कहीं
काश ! तयबा में, ऐ मेरे माह-ए-मुबीं !
दफ़्न होने को मिल जाए दो गज़ ज़मीं
तुम पे हर दम करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम
कोई हुस्न-ए-'अमल पास मेरे नहीं
फँस न जाऊँ क़ियामत में मौला कहीं
ऐ शफ़ी'-ए़-उमम ! लाज रखना तुम्हीं
तुम पे हर दम करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम
दोनों 'आलम में कोई भी तुम सा नहीं
सब हसीनों से बढ़ कर के तुम हो हसीं
क़ासिम-ए-रिज़्क़-ए-रब्ब-उल-'उला हो तुम्हीं
तुम पे हर दम करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम
फ़िक्र-ए-उम्मत में रातों को रोते रहे
'आसियों के गुनाहों को धोते रहे
तुम पे क़ुर्बान जाऊँ, मेरे मह-ज़बीं !
तुम पे हर दम करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम
फूल रहमत के हर दम लुटाते रहे
याँ ग़रीबों की बिगड़ी बनाते रहे
हौज़-ए-कौसर पे मत भूल जाना कहीं
तुम पे हर दम करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम
ज़ुल्म, कुफ़्फ़ार के हँस के सहते रहे
फिर भी हर आन हक़ बात कहते रहे
कितनी मेहनत से की तुम ने तब्लीग़-ए-दीं
तुम पे हर दम करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम
मौत के वक़्त कर दो निगाह-ए-करम
काश ! इस शान से ये निकल जाए दम
संग-ए-दर पर तुम्हारे हो मेरी जबीं
तुम पे हर दम करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम
अब मदीने में हम को बुला लीजिए
और सीना मदीना बना दीजिए
अज़-प-ए-ग़ौस-ए-आ'ज़म, इमाम-ए-मुबीं !
तुम पे हर दम करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम
'इश्क़ से तेरे मा'मूर सीना रहे
लब पे हर दम मदीना-मदीना रहे
बस मैं दीवाना बन जाऊँ, सुल्तान-ए-दीं !
तुम पे हर दम करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम
दूर हो जाएँ दुनिया के रंज-ओ-अलम
हो 'अता अपना ग़म, दीजिए चश्म-ए-नम
माल-ओ-दौलत की कसरत का तालिब नहीं
तुम पे हर दम करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम
अब बुला लो मदीने में 'अत्तार को
अपने क़दमों में रख लो गुनहगार को
कोई इस के सिवा आरज़ू ही नहीं
तुम पे हर दम करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम
शायर:
मुहम्मद इल्यास अत्तार क़ादरी
ना'त-ख़्वाँ:
ओवैस रज़ा क़ादरी
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