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तुम्हें जो दिल से पुकारा मेरे ग़रीब नवाज़

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तुम्हें जो दिल से पुकारा मेरे ग़रीब नवाज़

तुम्हें जो दिल से पुकारा, मेरे ग़रीब-नवाज़ !  
ब-वक़्त पाया सहारा, मेरे ग़रीब-नवाज़ !  

'अली के नूर-ए-नज़र, फ़ातिमा के लख़्त-ए-जिगर  
नबी की आँख का तारा, मेरे ग़रीब-नवाज़ !  

समाया सारा अना सागर एक कूज़े में  
सुना जो हुक्म तुम्हारा, मेरे ग़रीब-नवाज़ !  

तुम्हीं से हिन्द में ईमाँ की रौशनी फैली  
तुम्हीं ने दीन सँवारा, मेरे ग़रीब-नवाज़ !  

जहाँ दु'आएँ हमेशा क़ुबूल होती हैं  
वो आस्ताँ है तुम्हारा, मेरे ग़रीब-नवाज़ !  

जो डूबा दरिया-ए-रहमत में आप की, ख़्वाजा !  
मिला न उस को किनारा, मेरे ग़रीब-नवाज़ !  

बना लो अपना गदा कहता है यही साबिर  
ख़ुदा-रा कर दो इशारा, मेरे ग़रीब-नवाज़ !  
 

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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