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आ गए हुज़ूर आ गए

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आ गए हुज़ूर आ गए

जश्न-ए-'ईद-ए-बारहवीं मना
आ गए हुज़ूर आ गए
गूँज उठी सदा-ए-मरहबा
आ गए हुज़ूर आ गए

'अर्श-ओ-फ़र्श की थी गुफ़्तुगू
मैं बड़ा हूँ या बड़ा है तू
फ़र्श बोला अब हूँ मैं बड़ा
आ गए हुज़ूर आ गए

जश्न-ए-'ईद-ए-बारहवीं मना
आ गए हुज़ूर आ गए
गूँज उठी सदा-ए-मरहबा
आ गए हुज़ूर आ गए

बकरी बोली हम भी शेर हैं
या'नी आज से दिलेर हैं
दौर-ए-क़त्ल-ओ-ख़ून लद गया
आ गए हुज़ूर आ गए

जश्न-ए-'ईद-ए-बारहवीं मना
आ गए हुज़ूर आ गए
गूँज उठी सदा-ए-मरहबा
आ गए हुज़ूर आ गए

मारी जा चुकी हो, बेटियो !
अब वक़ार-ओ-फ़ख़्र से जियो
कट चुका है पंजा-ए-जफ़ा
आ गए हुज़ूर आ गए

जश्न-ए-'ईद-ए-बारहवीं मना
आ गए हुज़ूर आ गए
गूँज उठी सदा-ए-मरहबा
आ गए हुज़ूर आ गए

थरथराने, काँपने लगा
चीख़ उठे पुजारी, क्या हुआ ?
बुत ये कहते सज्दे में गिरा
आ गए हुज़ूर आ गए

जश्न-ए-'ईद-ए-बारहवीं मना
आ गए हुज़ूर आ गए
गूँज उठी सदा-ए-मरहबा
आ गए हुज़ूर आ गए


शायर:

हबीबुल्लाह फ़ैज़ी

ना'त-ख़्वाँ:

हबीबुल्लाह फ़ैज़ी
क़ारी रियाज़ुद्दीन अशरफ़ी

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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