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आसियों को दर तुम्हारा मिल गया | ठिकानों को ठिकाना मिल गया

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आसियों को दर तुम्हारा मिल गया | ठिकानों को ठिकाना मिल गया

आसियों को दर तुम्हारा मिल गया,
बे ठिकानों को ठिकाना मिल गया।

फज़्ल ए रब से फिर कमी किस बात की,
मिल गया सब कुछ जो तैयबा मिल गया।

कश्फ ए राज़ ए मन रआनी यूं हुआ,
तुम मिले तो हक़ तआला मिल गया।

बेखुदी है बाइस ए कश्फ ए हिजाब,
मिल गया मिलने का रस्ता मिल गया।

उन के दर ने सब से मुस्तग्नि किया,
बे तलब बे ख्वाहिश इतना मिल गया।

न खुदाई के लिए आये हुज़ूर  (ﷺ),
डूबतो निकलो सहारा मिल गया।

दोनों आलम से मुझे क्यूं खो दिया,
नफ्स ए खुद मतलब तुझे क्या मिल गया।

आंखे पुरनम हो गए सर झुक गया,
जब तेरा नक्श ए कफे पा मिल गया।

खुल्द कैसा क्या चमन किसका वतन,
मुझको सहराए मदीना मिल गया।

है मोहब्बत किस कदर नाम ए खुदा,
नाम ए हक़ से नाम ए वाला मिल गया।

उन के तालिब ने जो चाहा पा लिया,
उन के साईल ने हो मांगा मिल गया।

तेरे दर के टुकड़े हैं और मैं गरीब,
मुझको रोज़ी का ठिकाना मिल गया।

ऐ «हसन» फिरदौस में जाएं जनाब,
हमको सहराए मदीना मिल गया।

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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