भाषा:

खोजें

अंबिया को भी अजल आनी है | गर ऐसी की फक़त आनी है।

  • यह साझा करें:
अंबिया को भी अजल आनी है | गर ऐसी की फक़त आनी है।


अंबिया को भी अजल आनी है,

मगर ऐसी की फक़त आनी है।

 

फिर उसी आन के बाद उनकी हयात,

मिस्ल_ए_साबिक वही जिस्मानी है।

 


रूह तो सबकी ज़िंदा है उनका,

जिस्म ए पुरनूर भी रूहानी है।

 

 

औरों की रूह हो कितनी ही लतीफ,

उन के अज्साम की कब सानी है।

 

 

पाऊं जिस खाक पे रख दे वो भी,

रूह है पाक है रूहानी है।

 


उस की अज़वाज को जायज़ है निकाह,

उसका तर्का बेटे को फानी है।

 

 

ये है हयय अ–बदी उनको रज़ा,

सिद्क ए वा’दा क़ज़ा मानी है।

टैग:
Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

एक टिप्पणी छोड़ें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा। आवश्यक फ़ील्ड * से चिह्नित हैं

Your experience on this site will be improved by allowing cookies Cookie Policy