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अपने दर पर, अपने मंगतों को बुलाएं गौसे पाक

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अपने दर पर, अपने मंगतों को बुलाएं गौसे पाक
शाह-ए-जिलां, पीर-ए-पीरां
मुर्शिद मेरे गौस-ए-पाक
 
अपने दर पर, अपने मंगतों को बुलाएं गौस-ए-पाक !
और अपनी दीद का, शरबत पिलाएं गौस-ए-पाक !
 
हो रही है आपकी हम पर अता अये गौस-ए-पाक !
क्यों न फिर हम आपके नारे लगाएं गौस-ए-पाक !
 
सुल्तान-ए-विलायत गौस-ए-पाक
वलीयों पे हुकूमत गौस-ए-पाक
शहबाज़-ए-क़िताबत गौस-ए-पाक
फ़ानूस-ए-हिदायत गौस-ए-पाक
सरताज-ए-शरीयत गौस-ए-पाक
 
अपने दर पर, अपने मंगतों को बुलाएं गौस-ए-पाक !
और अपनी दीद का, शरबत पिलाएं गौस-ए-पाक !
 
है वो तेरा दब-दबा के तेरे नाम-ए-पाक से
थर-थराते हैं सभी जिन्न-ओ-बलाएं ग़ौस-ए-पाक
 
अपने दर पर, अपने मंगतों को बुलाएं गौस-ए-पाक
और अपनी दीद का, शरबत पिलाएं गौस-ए-पाक
 
आप मेरे दिल जिगर में और आँखों में रहे
याद बन कर मेरी नस-नस में समाएं ग़ौस-ए-पाक
 
अपने दर पर, अपने मंगतों को बुलाएं ग़ौस-ए-पाक
और अपनी दीद का, शरबत पिलाएं ग़ौस-ए-पाक
 
बे-वफा हैं हम निभा पाए ने कुछ भी आप से
हश्र तक बस आपही हमको निभाएं ग़ौस-ए-पाक
 
अपने दर पर, अपने मंगतों को बुलाएं गौस-ए-पाक
और अपनी दीद का, शरबत पिलाएं गौस-ए-पाक
 
जां-कनी का वक़्त है बहरे अली-उल-मुर्तज़ा
अपने खाकी के सिरहाने आप आएं ग़ौस-ए-पाक
 
अपने दर पर, अपने मंगतों को बुलाएं गौस-ए-पाक
और अपनी दीद का, शरबत पिलाएं गौस-ए-पाक
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Mohammad Wasim

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