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बख्त-ए-ख़ूफ्ता ने मुझे रोज़े पे जाने न दिया

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बख्त-ए-ख़ूफ्ता ने मुझे रोज़े पे जाने न दिया

बख्त-ए-ख़ूफ्ता ने मुझे रोज़े पे जाने न दिया
चश्म-ओ-दिल सीने कलेजे से लगाने न दिया
 
आह ! क़िस्मत मुझे दुनिया के ग़मों ने रोका
हाये तक़दीर के तैबा मुझे जाने न दिया
 
पाओं थक जाते अगर पाओं बनाता सर को
सर के बल जाता मगर जो'फ ने जाने न दिया
 
सर तो सर जान से जाने की मुझे हसरत है
मौत ने हाये मुझे जान से जाने न दिया
 
शरबत-ए-दीद ने और आग लगादी दिल में 
तपिश-ए-दिल को बढ़ाया है बुझाने न दिया
 
अब कहाँ जाएगा नक्शा तेरा मेरे दिल से
तेह में रक्खा है इसे दिल ने गुमाने न दिया
 
सजदा करता जो अगर मुझे इसकी इजाज़त होती
क्या करूँ इज़्न मुझे इसका ख़ुदा ने न दिया 
 
मेरे आ'माल का बदला तो जहन्नम ही था
मैं तो जाता मुझे सरकार ने जाने न दिया
 
मेरे आ'माल-ए-सिया ने किया जीना दूबर
ज़हर खाता तेरे इरशाद ने खाने न दिया
 
नफ़्स-ए-बदकार ने दिल पर ये क़ियामत तोड़ी
अमल-ए-नैक किया भी तो छुपाने न दिया
 
और चमकती सी ग़ज़ल कोई पढ़ो अये नूरी
रंग अपना अभी जमने शो'अरा ने न दिया
Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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