बंदा हूं तेरे दर का ऐ सैय्यद-ए-जिलानी,
कहलता हूं मैं तेरा ऐ सैय्यद-ए-जिलानी।
है सिलसिला-ए-उल्फत उस ज़ूल्फ-ए-मुसलसल से,
सर पे है तेरा सौदा ऐ सैय्यद-ए-जिलानी।
तेरे रुख-ए-ज़ेबा पर मेरा दिल-ए-दीवाना,
सौ जान से है शैदा ऐ सैय्यद-ए-जिलानी।
इस इज़्ज़-ओ-करामत का इस शान-ए-जलालत का है,
आलम में नहीं तुझसा ऐ सैय्यद-ए-जिलानी।
मुश्ताक-ए-ज़ियारत है ऐ अशरफ़ी बे-दिल,
बगदाद इसे बुलवा ऐ सैय्यद-ए-जिलानी ।
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