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बंदा हूं तेरे दर का ऐ सैय्यद-ए-जिलानी

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बंदा हूं तेरे दर का ऐ सैय्यद-ए-जिलानी

 बंदा हूं तेरे दर का ऐ सैय्यद-ए-जिलानी,

कहलता हूं मैं तेरा ऐ सैय्यद-ए-जिलानी।

है सिलसिला-ए-उल्फत उस ज़ूल्फ-ए-मुसलसल से,

सर पे है तेरा सौदा ऐ सैय्यद-ए-जिलानी।

तेरे रुख-ए-ज़ेबा पर मेरा दिल-ए-दीवाना,

सौ जान से है शैदा ऐ सैय्यद-ए-जिलानी।  
 

इस इज़्ज़-ओ-करामत का इस शान-ए-जलालत का है,

आलम में नहीं तुझसा ऐ सैय्यद-ए-जिलानी।  
 

मुश्ताक-ए-ज़ियारत है ऐ अशरफ़ी बे-दिल,

बगदाद इसे बुलवा ऐ सैय्यद-ए-जिलानी ।

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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