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बयां हो किस ज़बां से मरतबा सिद्दीक़-ए-अकबर का

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बयां हो किस ज़बां से मरतबा सिद्दीक़-ए-अकबर का

बयां हो किस ज़बां से मरतबा सिद्दीक़-ए-अकबर का,
है यार-ए-गार महबूब-ए-खुदा सिद्दीक-ए-अकबर का।

इलाही रहम फरमा खादिम-ए-सिद्दीक-ए-अकबर हूं,
तेरी रहमत के सदके वास्ता सिद्दीक-ए-अकबर का।

रूसूल और अंबिया के बाद जो अफज़ल हो आलम में,
ये आलम में है किसका मरतबा सिद्दीक-ए-अकबर का।

गदा सिद्दीक-ए-अकबर का खुदा से फ़ज़्ल पाता है,
खुदा के फ़ज़्ल से मैं हूं गदा सिद्दीक-ए-अकबर का।


नबी ﷺ का और खुदा का मदह-गो सिद्दीक-ए-अकबर है,

नबी ﷺ सिद्दीक-ए-अकबर का, खुदा सिद्दीक-ए-अकबर का।

ज़िया में महर-ए-आलम ताब का यूँ नाम कब होता,
ना होता नाम अएलगर वजह-ए-ज़िया सिद्दीक-ए-अकबर का।

ज़ईफ़ी में ये क़ुव्वत है ज़ईफ़ों को क़वी कर दें,
सहारा लें ज़ईफ़ो-अक़विया सिद्दीक-ए-अकबर का।

खुदा इकराम फरमाता है अतका कह के कुरआं में,
करेँ फ़िर क्यों न इकराम अतिकिया सिद्दीक़-ए-अकबर का।


सफा वो कुछ मिली खाक-ए-सिर कु-ए-पयम्बर से,
मुसफ्फा आइना है नक्श-ए-पा सिद्दीक-ए-अकबर का.

हुए फारूक-ओ-उस्मान-ओ-अली जब दखिल-ए-बैअत,
बना फख्र-ए-सलासिल सिलसिला सिद्दीक-ए-अकबर का.

मकाम-ए-ख्वाब-ए-राहत चैन से आराम करने को,
बना पहलू-ए-महबूब-ए-खुदा सिद्दीक-ए-अकबर का.


अली हैं उसके दुश्मन और वो दुश्मन अली का है,
जो दुश्मन अक्ल का दुश्मन हुआ सिद्दीक-ए-अकबर का.

लुटाया राह-ए-हक़ में घर कई बार इस मोहब्बत में,
के लूट कर हसन घर बन गया सिद्दीक-ए-अकबर का।

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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