भाषा:

खोजें

दिल हाये गुनाहों से बेज़ार नहीं होता

  • यह साझा करें:
दिल हाये गुनाहों से बेज़ार नहीं होता

दिल हाये ! गुनाहों से बेज़ार नहीं होता
मग़लूब शहा ! नफ़्से बदकार नहीं होता

जो लाख करूँ कोशिश इस्लाह नहीं होती
पाकीज़ा गुनाहों से किरदार नहीं होता

गुनाहों की नहीं जाती है आदत या रसूलल्लाह !
तुम्ही अब कुछ करो माहे रिसालत या रसूलल्लाह !

में बचना चाहता हूँ हाये फिर भी बच नहीं पाटा
गुनाहों की पड़ी है ऐसी आदत या रसूलल्लाह !

लगा तकिया गुनाहों का पड़ा दिन रात रहता हूँ
मुझे अब ख्वाबे गफलत से जगादो या रसूलल्लाह

ये सांस की माला अब बस टूटने वाली है
दिल आह ! मगर अब भी बेदार नहीं होता

कोशिशें तो की बहोत मगर रहे नाकाम हम
आप चाहें तो अभी बेड़ा हमारा पार हो

अये रब के हबीब ! आओ , अये मेरे तबीब ! आओ
अच्छा ये गुनाहों का बीमार नहीं होता

आक़ा का गदा हो कर अत्तार तू गबराए
गबराए वही जिसका गमख्वार नहीं होता
Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

एक टिप्पणी छोड़ें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा। आवश्यक फ़ील्ड * से चिह्नित हैं

Your experience on this site will be improved by allowing cookies Cookie Policy