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दूर ए दिल रहें मदीने से

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दूर ए दिल रहें मदीने से

दूर, ए दिल ! रहें मदीने से
मौत बेहतर है ऐसे जीने से

उन से मेरा सलाम कह देना
जा के तू, ए सबा ! क़रीने से

हर गुल-ए-गुल्सिताँ मो'अत्तर है
जान-ए-गुलज़ार के पसीने से

यूँ चमकते हैं ज़र्रे तयबा के
जैसे बिखरे हुए नगीने से

ज़िक्र-ए-सरकार करते हैं मोमिन
कोई मर जाए जल के कीने से

बारगाह-ए-ख़ुदा में क्या पहुँचे !
गिर गया जो नबी के ज़ीने से

पी जिए चश्म-ए-नाज़ से उन की
मय-कशों का भला है पीने से

उस तजल्ली के सामने, अख़्तर !
गुल को आने लगे पसीने से
Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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