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एक मैं ही नहीं उन पर क़ुर्बान ज़माना है

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एक मैं ही नहीं उन पर क़ुर्बान ज़माना है
एक में ही नहीं उन पर, क़ुर्बान ज़माना है
जो रब्बे दो आलम का मेहबूब यगाना है

कल पुल से हमें जिसने , खुद पार लगाना है
ज़हरा का वो बाबा है, हसनैन का नाना है
 
एक में ही नहीं उन पर, क़ुर्बान ज़माना है
जो रब्बे दो आलम का मेहबूब यगाना है

आओ दरे ज़हरा पर , फैलाए हुए दामन
है नस्ल करीमों की, लाजपाल घराना है

एक में ही नहीं उन पर, क़ुर्बान ज़माना है
जो रब्बे दो आलम का मेहबूब यगाना है

इज़्ज़त से न मर जाएं, क्यों नाम मुहम्मद पर
यूँहीं किसी दिन हमने, दुनिया से तो जाना है

एक में ही नहीं उन पर, क़ुर्बान ज़माना है
जो रब्बे दो आलम का मेहबूब यगाना है

सरकार मदीना की हूँ पश्ते पनाही में
दुनिया की है क्या परवाह, दुश्मन जो ज़माना है

एक में ही नहीं उन पर, क़ुर्बान ज़माना है
जो रब्बे दो आलम का मेहबूब यगाना है

ये कहके दरे हक़ से, ली मौत में कुछ मोहलत
मिलाद की आमद है, महफ़िल को सजाना है

एक में ही नहीं उन पर, क़ुर्बान ज़माना है
जो रब्बे दो आलम का मेहबूब यगाना है

मेहरूमे करम इसको रखिये न सरे महेशर
जैसा है नसीर आखिर, साईल तो पुराना है
 
एक में ही नहीं उन पर, क़ुर्बान ज़माना है
जो रब्बे दो आलम का मेहबूब यगाना है
Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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