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एक नज़र आसमाँ पे डाल मरहबा | चमका माह-ए-नूर का हिलाल मरहबा

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एक नज़र आसमाँ पे डाल मरहबा | चमका माह-ए-नूर का हिलाल मरहबा

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

बेकसों से है जिन्हें प्यारा वोही आए हैं
जो दो 'आलम के हैं ग़म-ख़्वार वोही आए हैं

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

एक नज़र आसमाँ पे डाल, मरहबा !
चमका माह-ए-नूर का हिलाल, मरहबा !

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

बेकसों से है जिन्हें प्यारा वोही आए हैं
जो दो 'आलम के हैं ग़म-ख़्वार वोही आए हैं

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

झंडे लगाओ, गलियाँ सजाओ
कर लो चराग़ाँ, घर जगमगाओ
राज़ी होगा रब्ब-ए-ज़ुल्जलाल, मरहबा !

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

बेकसों से है जिन्हें प्यारा वोही आए हैं
जो दो 'आलम के हैं ग़म-ख़्वार वोही आए हैं

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

महफ़िल सजाएँ, ना'तें सुनाएँ
आक़ा की आमद की धूमें मचाएँ
रोज़-ओ-शब यही हो अपना हाल, मरहबा !

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

बेकसों से है जिन्हें प्यारा वोही आए हैं
जो दो 'आलम के हैं ग़म-ख़्वार वोही आए हैं

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

ला-रैब नबियों के सालार आए
आए दो 'आलम के ग़म-ख़्वार आए
शाहकार-ए-रब्ब-ए-ज़ुल्जलाल, मरहबा !

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

बेकसों से है जिन्हें प्यारा वोही आए हैं
जो दो 'आलम के हैं ग़म-ख़्वार वोही आए हैं

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

'आशिक़ के दिल जगमगाने लगे हैं
देखो ज़रा मुस्कुराने लगे हैं
दीदनी है उन के ख़द-ओ-ख़ाल, मरहबा !

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

बेकसों से है जिन्हें प्यारा वोही आए हैं
जो दो 'आलम के हैं ग़म-ख़्वार वोही आए हैं

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

सदक़ा विलादत का जल्वा दिखा दो
दिल की लगी अब तो, आक़ा ! बुझा दो
दिखला दो अपना अब जमाल, मरहबा !

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

बेकसों से है जिन्हें प्यारा वोही आए हैं
जो दो 'आलम के हैं ग़म-ख़्वार वोही आए हैं

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

जूद-ओ-सख़ावत है 'आदत तुम्हारी
फैलाए दामन खड़े हैं भिकारी
कर दो करम आमिना के लाल, मरहबा !

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

बेकसों से है जिन्हें प्यारा वोही आए हैं
जो दो 'आलम के हैं ग़म-ख़्वार वोही आए हैं

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

जाम-ए-शहादत पिया है जिन्हों ने
अहल-ए-सुनन को जिला दी उन्हों ने
याद आएँगे वो हर साल, मरहबा !

शादी के नग़्मे सुनाते रहेंगे
जश्न-ए-विलादत मनाते रहेंगे
वार देंगे तुम पे जान-ओ-माल, मरहबा !

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

बेकसों से है जिन्हें प्यारा वोही आए हैं
जो दो 'आलम के हैं ग़म-ख़्वार वोही आए हैं

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

पढ़ने लगा जब 'उबैद उन की ना'तें
होने लगीं चार-सू उस की बातें
फ़ैज़-ए-रज़ा का है सब कमाल, मरहबा !

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !

बेकसों से है जिन्हें प्यारा वोही आए हैं
जो दो 'आलम के हैं ग़म-ख़्वार वोही आए हैं

या रसूलल्लाह ! मरहबा मरहबा !
या हबीबल्लाह ! मरहबा मरहबा !


शायर:

ओवैस रज़ा क़ादरी

ना'त-ख़्वाँ:

ओवैस रज़ा क़ादरी

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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