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फलक से मलक आ गए हैं ज़मीं पर

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फलक से मलक आ गए हैं ज़मीं पर
फलक से मलक आ गए हैं ज़मीं पर 
ख़ुदा का दुरूद-ओ-सलाम आ रहा है
 
समाज सोच कर ही , कदम अपने रखना
ये शहर-ए-नबी है , ज़रा तुम संभलना
अदब की ज़मीं है , अदब ही से चलना
वो देखो अदब का मकाम आ रहा है
 
वो शम्स-उद-दुहा है , वो बदरुद्दुजा है
शफी-उल-वरा है , समज से सिवा है
ये ज़िंदा अक़ीदा , ये सुथरा तरिका
क़यामत की मुश्किल में काम आ रहा है
 
जो ज़ैनब ने पूछा , के क्या हो गया है
तो शब्बीर बोले अभी सो गया है
इस असग़र की अब तिश्नगी बुज गयी है
ये पीकर शहादत का जाम आ रहा है
Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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