गुलदान ए मुर्तज़ा के हैं गुलाब गौस ए आज़म,
हैं सितारे औलिया तो माहताब गौस ए आज़म।
अभी चांदनी लुटाए भरी दोपहर का सूरज,
तू हटा दे अपने रुख से जो नक़ाब गौस ए आज़म।
जिस हर्फ हर्फ पढ़ कर हुए औलिया भी कामिल,
वही नूर ए मारिफ़त की है किताब गौस ए आज़म।
तेरा ज़िक्र अब्र ए रहमत, तेरी फ़िक्र जान ए रहमत,
तुझे सोचना मुसलसल है सबाब गौस ए आज़म।
तुझे मुस्तफा (ﷺ) के सदके वो मक़ाम रब ने बख्शा,
न मिसाल औलिया में न जवाब गौस ए आज़म।
तेरे जलवा ए हसीं से कोई क्या नज़र मिलाए,
भला किसमे इतनी होगी तब–ताब गौस ए आज़म।
तेरा इश्क़ रखने वाला हुआ जन्नती मुसाफिर,
तेरा बुग्ज़ तो खुदा है अज़ाब गौस ए आज़म।




