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गुलदान ए मुर्तज़ा के हैं गुलाब गौस ए आज़म

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गुलदान ए मुर्तज़ा के हैं गुलाब गौस ए आज़म

गुलदान ए मुर्तज़ा के हैं गुलाब गौस ए आज़म,

हैं सितारे औलिया तो माहताब गौस ए आज़म।

 

अभी चांदनी लुटाए भरी दोपहर का सूरज,

तू हटा दे अपने रुख से जो नक़ाब गौस ए आज़म।

 

जिस हर्फ हर्फ पढ़ कर हुए औलिया भी कामिल,

वही नूर ए मारिफ़त की है किताब गौस ए आज़म।

 

तेरा ज़िक्र अब्र ए रहमत, तेरी फ़िक्र जान ए रहमत,

तुझे सोचना मुसलसल है सबाब गौस ए आज़म।

 

तुझे मुस्तफा (ﷺ) के सदके वो मक़ाम रब ने बख्शा,

न मिसाल औलिया में न जवाब गौस ए आज़म।

 

तेरे जलवा ए हसीं से कोई क्या नज़र मिलाए,

भला किसमे इतनी होगी तब–ताब गौस ए आज़म।

 

तेरा इश्क़ रखने वाला हुआ जन्नती मुसाफिर,

तेरा बुग्ज़ तो खुदा है अज़ाब गौस ए आज़म।

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Mohammad Wasim

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