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गुनाहों की आदत छुड़ा मेरे मौला

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गुनाहों की आदत छुड़ा मेरे मौला

गुनाहों की आदत छुड़ा मेरे मौला ! 
मुझे नेक इन्सां बना मेरे मौला !

जो तुझको जो तेरे नबी को पसंद है
मुझे ऐसा बंदा बना मेरे मौला !

तू मसजूद मेरा, मैं साजिद हूँ तेरा
तू मालिक मैं बंदा तेरा मेरे मौला !

तू लेगा अगर 'अदल से काम अपने
मैं हूँ मुस्तहिक़ नार का मेरे मौला ! 

जो रहमत तेरी शामिल-ए-हाल हो तो
ठिकाना है जन्नत मेरा मेरे मौला ! 

तुझे तो ख़बर है मैं कितना बुरा हूँ
तू ऐबों को मेरे छुपा मेरे मौला ! 

मेरी ता-क़यामत जो नस्लें हों या रब !
हों सब 'आशिक़-ए-मुस्तफा मेरे मौला !

न मोहताज कर तू जहां में किसी का
मुझे मुफलिसी से बचा मेरे मौला !

हैं का'बे पे नज़रें उबैद-ए-रज़ा की
हो मक़बूल हर एक दुआ मेरे मौला !

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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