हिफ़्ज़-ए-मरातिब, मर्द-ए-क़लंदर मेरे आ'ला हज़रत हैं
'इश्क़-ओ-वफ़ा और 'इल्म के पैकर मेरे आ'ला हज़रत हैं
हिफ़्ज़-ए-मरातिब, मर्द-ए-क़लंदर मेरे आ'ला हज़रत हैं
जिन से अपने वक़्त के मुफ़्ती 'इल्म का सदक़ा माँगते हैं
'इल्म-ओ-अदब के ऐसे समंदर मेरे आ'ला हज़रत हैं
हिफ़्ज़-ए-मरातिब, मर्द-ए-क़लंदर मेरे आ'ला हज़रत हैं
फ़तवे में और तक़्वे में, आक़ा की सना में आज कहीं
जिन का नहीं है कोई भी हम-सर मेरे आ'ला हज़रत हैं
हिफ़्ज़-ए-मरातिब, मर्द-ए-क़लंदर मेरे आ'ला हज़रत हैं
क़ाते'-ए-शिर्क-ओ-बिद'अत जिन को सारा ज़माना कहता है
मौला 'अली की तेग़ का तेवर मेरे आ'ला हज़रत हैं
हिफ़्ज़-ए-मरातिब, मर्द-ए-क़लंदर मेरे आ'ला हज़रत हैं
जिन के नाम से आज भी दुश्मन ख़ौफ़ से काँपने लगते हैं
दीन-ए-नबी के ऐसे ख़ंजर मेरे आ'ला हज़रत हैं
हिफ़्ज़-ए-मरातिब, मर्द-ए-क़लंदर मेरे आ'ला हज़रत हैं
दीन-ए-मुहम्मद की ख़िदमत को, 'इश्क़-ए-मुहम्मद में ढल कर
जो हैं लगाते तख़्त को ठोकर मेरे आ'ला हज़रत हैं
हिफ़्ज़-ए-मरातिब, मर्द-ए-क़लंदर मेरे आ'ला हज़रत हैं
शौक़-ए-फ़रीदी ! राह-ए-हिदायत से मैं कैसे भटकूँगा
मेरे मुर्शिद मेरे रहबर मेरे आ'ला हज़रत हैं
हिफ़्ज़-ए-मरातिब, मर्द-ए-क़लंदर मेरे आ'ला हज़रत हैं
शायर:
मुहम्मद शौक़ीन नवाज़ शौक़ फ़रीदी
ना'त-ख़्वाँ:
मुहम्मद हस्सान रज़ा क़ादरी
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