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हर नज़र काँप उठेगी मेहशर के दिन

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हर नज़र काँप उठेगी मेहशर के दिन

हर नज़र काँप उट्ठेगी महशर के दिन, ख़ौफ़ से हर कलेजा दहल जाएगा
पर ये नाज़ उन के बंदे का देखेंगे सब, थाम कर उन का दामन मचल जाएगा

मौज कतरा के हम से चली जाएगी, रुख़ मुख़ालिफ़ हवा का बदल जाएगा
जब इशारा करेंगे वो नाम-ए-ख़ुदा, अपना बेड़ा भँवर से निकल जाएगा

यूँ तो जीता हूँ हुक्म-ए-ख़ुदा से मगर, मेरे दिल की है उन को यक़ीनन ख़बर
हासिल-ए-ज़िंदगी होगा वो दिन मेरा, उन के क़दमों पे जब दम निकल जाएगा

रब्ब-ए-सल्लिम वो फ़रमाने वाले मिले, क्यूँ सताते हैं, ऐ दिल ! तुझे वसवसे
पुल से गुज़रेंगे हम वज्द करते हुए, कौन कहता है पाँव फिसल जाएगा

अख़्तर-ए-ख़स्ता ! क्यूँ इतना बेचैन है ? तेरा आक़ा शहंशाह-ए-कौनैन है
लौ लगा तो सही शाह-ए-लौलाक से, ग़म मसर्रत के साँचे में ढल जाएगा

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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