हुआ जाता है रुखसत माह-ए-रमज़ां या रसूलल्लाह
हुआ जाता है रुखसत माह-ए-रमज़ां या रसूलल्लाह !
रहा अब चाँद गड़ियों का ये मेहमां या रसूलल्लाह !
ख़ुशी की लहर दौड़ी हर तरफ, रमजान जब आया
है अब रंजीदा रंजीदा मुसलमां या रसूलल्लाह !
मुसर्रत ही मुसर्रत और ख़ुशी ही थी ख़ुशी जिस दम
नज़र आया हिलाल-ए-माह-ए-रमज़ां या रसूलल्लाह !
शहा ! अब ग़म के मारे खून के आंसू बहाते हैं
चला तडपाके हाय माह-ए-रमज़ां या रसूलल्लाह !
चला अब जल्द ये रमज़ां सताइस आ गयी तारीख
फ़क़त दो दिन का अब रमज़ां है मेहमां या रसूलल्लाह !
रियाज़त कुछ न की हमने, इबादत कुछ न की हमने
रहे बस हर गड़ी मशगूल-ए-इस्यां या रसूआल्लह !
मैं हाय जी चुराता ही रहा रब की इबादत से
गुज़ारा गफलतों में सारा रमज़ां या रसूलल्लाह !
मैं सोता रह गया गफलत की चादर औड़ कर अफ़सोस
खुदरा मेरी बख्शीश का हो सामां या रसूलल्लाह !
खुदा के नेक बन्दे नेकियों में लग गए लेकिन
गुनाह करता रहा अत्तार नादां या रसूलल्लाह
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