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हुआ जाता है रुखसत माह-ए-रमज़ां या रसूलल्लाह

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हुआ जाता है रुखसत माह-ए-रमज़ां या रसूलल्लाह

हुआ जाता है रुखसत माह-ए-रमज़ां या रसूलल्लाह

हुआ जाता है रुखसत माह-ए-रमज़ां या रसूलल्लाह !
रहा अब चाँद गड़ियों का ये मेहमां या रसूलल्लाह !
 
ख़ुशी की लहर दौड़ी हर तरफ, रमजान जब  आया
है अब रंजीदा रंजीदा मुसलमां या रसूलल्लाह !
 
मुसर्रत ही मुसर्रत और ख़ुशी ही थी ख़ुशी जिस दम
नज़र आया हिलाल-ए-माह-ए-रमज़ां या रसूलल्लाह !
 
शहा ! अब ग़म के मारे खून के आंसू बहाते हैं 
चला तडपाके हाय माह-ए-रमज़ां या रसूलल्लाह !
 
चला अब जल्द ये रमज़ां सताइस आ गयी तारीख
फ़क़त दो दिन का अब रमज़ां है मेहमां या रसूलल्लाह !
 
रियाज़त कुछ न की हमने, इबादत कुछ न की हमने
रहे बस हर गड़ी मशगूल-ए-इस्यां या रसूआल्लह !
 
मैं हाय जी चुराता ही रहा रब की इबादत से
गुज़ारा गफलतों में सारा रमज़ां या रसूलल्लाह !
 
मैं सोता रह गया गफलत की चादर औड़ कर अफ़सोस
खुदरा मेरी बख्शीश का हो सामां या रसूलल्लाह !
 
खुदा के नेक बन्दे नेकियों में लग गए लेकिन
गुनाह करता रहा अत्तार नादां या रसूलल्लाह
Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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