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इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे

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इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
दोनों मासूम , मुस्लिम के प्यारे
फिरते थे जां बचाते , बे-चारे 
 
पांव में उनके छाले पड़े थे 
और जीने के लाले पड़े थे
तन्हा जंगल में थे बे-सहारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
हमसे पूछेगी माँ ये बताओ
हाल बाबा का अपने सुनाओ
क्या बताएंगे हम ग़म के मारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
चुप रहेगी हाँ आँखें बहेंगी
कैसे अम्मा ये सदमा सहेगी
जब सुनेगी गए वो तुम्हारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
देखी होती जो बाबा की तुर्बत
करते क़ुरआन की जा कर तिलावत
अब कहाँ जाएँ हम बे-सहारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
बोला भाई , करो सब्र भाई !
सब्र ही में है अपनी भलाई
हैं ये तक़दीर के सब नज़ारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
है ये परदेस मेरे बिरादर !
क्यों रुलाते हो तुम हमको रो कर
सुन ले , रोना न दुश्मन हमारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
होती आहट तो घबराते दोनों
सहम कर पीछे हट जाते दोनों
रात भर यूँ फिरे मारे-मारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
एक औरत जो पानी को आयी
शक्ल पानी में उनकी दिखाई
बर-फलक जैसे दो माह-पारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
पास आ कर कहा माह-पारों !
किस लिए तुम छुपे हो बताओ
ये कहो किसके हो तुम दुलारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
बोले हम दोनों आल-ए-नबी हैं
फातिमा की चमन की काली हैं
मौत पूछे पड़ी है हमारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
बोली वो , मोमिनों ! आओ आओ
तुम न रो-रो के मुझको रुलाओ 
दूर अल्लाह करे दुःख तुम्हारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
है वो बच्चों तुम्हारा घराना
खुत्बा पड़ता है जिसका ज़माना
पाँव धो-धो के पियूं तुम्हारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
ले गयी दोनों को घर बुला कर
खुश हुई उनको महमाँ बना कर
सो गए दोनों घर में बिचारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
रात को उसका शोहर जो आया
घर को महका हुआ उसने पाया
बोला , बीवी से क्या हैं नज़ारे 
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
चौंक उठे वो जब ख्वाब देखा
यानी लेने को आये हैं बाबा
रो पड़े दोनों क़िस्मत के मारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
उसने बच्चों को रोते जो देखा
उठके बिस्तर से अंदर वो पहुंचा
और पूछा हो किसके दुलारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
बोले हम इब्न-ए-मुस्लिम हैं भाई 
घर से क़िस्मत हमें खिंच लायी
बाबा मुस्लिम गए हाय मारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
ज़ुल्फ़ उनकी पकड़ कर घसीटा
और बे-दर्दी से उनको पीटा
ले चला उनको दरिया किनारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
उसकी बीवी ने देखा तो आयी
बोली , देती हूँ रब्ब की दुहाई
छोड़ दे बे-खता हैं बिचारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
क़त्ल मैं इनको करने न दूंगी
जीते जी इनको मरने न दूंगी
हैं ये मेहमान दोनों हमारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
ये तो आल-ए-रसूल-ए-ख़ुदा हैं
रुतबे इनके सिवा से सिवा हैं
हैं ये मुस्लिम की आँखों के तारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
बोला जो क़त्ल इनको करूँगा
ऊँचे से ऊँचा इनआम लूंगा
सामने से तू हट जा हमारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
अपनी बीवी को उसने हटाया 
जब न मानी तो खंजर चलाया
पहुंची जन्नत में कौसर किनारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
जल्द लेने को इनआम हाकिम
ले चला इब्न-ए-मुस्लिम को ज़ालिम
क़त्ल करने को दरिया किनारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
बोले वो छोड़ दे बे-खता हैं
नस्ल-ए-ज़ात-ए-हबीब-ए-ख़ुदा हैं
हम हैं बिन बाप के ग़म के मारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
माल चाहे तो हम माल देंगे
अपनी ज़ुल्फ़ों को हम बेच देंगे
क़त्ल से बाज़ आ तू हमारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
रहम आएगा जो तुझको हम पर
होंगे खुश तुजसे महबूब-ए-दावर
पायेगा ख़ुल्द के तू नज़ारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
रहम ज़ालिम को फिर भी न आया
क़त्ल करने को खंजर चलाया
दोनों घबरा गए वो बेचारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
 
बात मानी न एक बे-हया ने
कर दिया सर कलम पुर-जफ़ा ने
दोनों मासूम जन्नत सिधारे
इब्न-ए-मुस्लिम मुसीबत के मारे
Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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