जो भी दुश्मन है मेरे रज़ा का, जल रहा था जला है जलेगा
मस्लक-ए-आ'ला-हज़रत का ना'रा लग रहा है हमेशा लगेगा
बुग़्ज़-ओ-कीना का चश्मा लगा कर, नज़्दियों ने लिखा जो छुपा कर
आम हज़रत से तो बच गया है, आ'ला हज़रत से कैसे बचेगा ?
बा'द-अज़ाँ जिस की दुनिया में शोहरत, है रज़ा का सलाम-ए-मोहब्बत
मरहबा ! मुस्तफ़ा जान-ए-रहमत झूम कर उन का 'आशिक़ पढ़ेगा
वो रज़ा का घराना है, प्यारे ! 'इल्म का कारख़ाना है, प्यारे !
उन के टकसाल में जो ढलेगा, 'इल्म का इक हिमाला बनेगा
मुस्तफ़ा की 'इनायत से, प्यारे ! ग़ौस-ए-आ'ज़म की बरकत से, प्यारे !
अहल-ए-सुन्नत के बाज़ार में अब आ'ला हज़रत का सिक्का चलेगा
'इश्क़-ए-अहमद का मफ़्हूम क्या है ? नज़्दियो ! तुम को मा'लूम क्या है ?
आ'ला हज़रत के पैकर में देखो, 'इश्क़-ए-अहमद का जल्वा मिलेगा
दूध माँगोगे हम खीर देंगे, वर्ना बाग़ी को हम चीर देंगे
सुन्नियों से न ले कोई पंगा, वर्ना पंगा ये महँगा पड़ेगा
ग़ौस-ओ-ख़्वाजा की बेशक़ 'अता है, हिन्द में एक अहमद रज़ा है
अहल-ए-सुन्नत का जो मुक़्तदा है, वो बरेली में तुम को मिलेगा
हाथ मलते रहें मलने वाले, लाख जलते रहें जलने वाले
ग़ौस-ओ-ख़्वाजा के लुत्फ़-ओ-करम से आ'ला हज़रत का डंका बजेगा
वो रज़ा के चमन का सितारा, अहल-ए-सुन्नत के दिल का उजाला
अख़्तर-ए-क़ादरी सब के दिल पर, राज करता है करता रहेगा
एक टिप्पणी छोड़ें
आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा। आवश्यक फ़ील्ड * से चिह्नित हैं




