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जब गुम्बद-ए-खज़रा पे वो पहली नज़र गई

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जब गुम्बद-ए-खज़रा पे वो पहली नज़र गई
जब गुम्बद-ए-ख़ज़रा पे वो पहेली नज़र गयी
आँखों के रास्ते मेरे दिल में उतर गयी
 
जब गुम्बद-ए-ख़ज़रा पे वो पहेली नज़र गयी
 
बरसी थी इस क़दर के नहा सा गया उधर
वो बारिश-ए-करम मेरे दामन को भर गयी
 
जब गुम्बद-ए-ख़ज़रा पे वो पहेली नज़र गयी
 
सर ख़म था, लब खामोश थे, आँखें थीं अश्कबार
एक सा'अत-ए-बेदार थी जो के गुज़र गयी
 
जो कह सका न लब से मिली वो मुराद भी
मेरे सुकूत पर भी शहा की नज़र गयी 
 
जब गुम्बद-ए-ख़ज़रा पे वो पहेली नज़र गयी
 
तयबाह से लौटना किसी आशिक़ से पूछिए
ऐसा लगे के रूह बदन से गुज़र गयी
 
जब गुम्बद-ए-ख़ज़रा पे वो पहेली नज़र गयी
 
आवाज़ उबैद तेरी ब-फैज़ान-नात ही
सीनों में आशिकान-ए-नबी के उतर गयी
 
जब गुम्बद-ए-ख़ज़रा पे वो पहेली नज़र गयी
Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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