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जब तक जियूं में आक़ा कोई गम न पास आये

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जब तक जियूं में आक़ा कोई गम न पास आये

जब तक जियूं में आक़ा ! कोई गम न पास आये
जो मरुँ तो हो लहद पर , तेरी रहमतों के साये

हैं ख़िज़ाँ ने डाले डेरे, मुर्जा गए हैं सब गुल
मेरे उजड़े बाग़ में फिर , आक़ा ! बहार आये

मेरी ज़िन्दगी का मक़सद , हो अये काश ! इश्के अहमद
मुझे मौत भी जो आये , इसी जुस्तजू में आये

मुझे मौत ज़िन्दगी दे, मुझे ज़िन्दगी मजा दे
जो किताब-ए-ज़िन्दगी पर , मोहर अपनी वो लगाए

तु बसा दे मेरे दिल में हाँ ! उसी की याद मालिक !
वो जो वक़्त-ए-नज़ा आ कर, कलमा भी याद दिलाये

न तो कर सका है कोई , न करेगा प्यार ऐसा
जो लहद में आशिकों को देके थपकियाँ सुलाए

वो दिया जो बुज गया था , वो जो खो गयी थी सोज़ाँ
हुआ हर तरफ उजाला , जो हुज़ूर मुस्कुराए

चली आंधियां ग़मों की , गिरी बिजलियाँ दुखों की
ये तेरा करम है आक़ा ! के क़दम न लड़खड़ाए

जिसे मारा हो ग़मों ने, जिसे गेरा हो दुखों ने
मेरा मश्वरा है उसको , वो मदीना होके आये

दर-ए-यार पर पड़ा हूँ, इस उसूल पर गिरा हूँ
जो गिरा हुआ हो खुद ही , उसे कौन अब गिराए

में गुलामे पंजतन हूँ , बेसहारा न समझना
में हूँ गौस का दीवाना , कोई हाथ न लगाए

यही आरज़ू दिली है, तेरे बज़्म पर किसी दिन
ये तेरा उबैद आये , तुजे नात भी सुनाए

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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