का'बे के दर के सामने माँगी है ये दु'आ फ़क़त
हाथों में हश्र तक रहे दामन-ए-मुस्तफ़ा फ़क़त
नज़'अ के वक़्त जब मेरी साँसों में इंतिशार हो
मेरी नज़र के सामने गुंबद हो वो हरा फ़क़त
तयबा की सैर को चलें, क़दमों में उन के जान दें
दफ़्न हों उन के शहर में, है यही इल्तिजा फ़क़त
दुनिया की सारी ने'मतें मेरी नज़र में हेच हों
रखने को सर पे गर मिलें ना'लैन-ए-मुस्तफ़ा फ़क़त
अपने करम से, ऐ ख़ुदा ! 'इश्क़-ए-रसूल कर 'अता
आख़िरी दम ज़बाँ पे हो सल्ले-'अला सदा फ़क़त
यूँ तो हर इक नबी वली रब के हुज़ूर हैं शफ़ी'
शाफ़े'-ए-रोज़-ए-हश्र का हम को है आसरा फ़क़त
मुन्कर-नकीर क़ब्र में हम से सवाल जब करें
ऐसे में विर्द हम रखें आप के नाम का फ़क़त
ना'त-ए-रसूल-ए-पाक है नज़्मी का मक़्सद-ए-हयात
आख़िरी दम लबों पे हो सरकार की सना फ़क़त
ना'त-ए-रसूल-ए-पाक है नज़्मी का मक़्सद-ए-हयात
क़ब्र में भी लबों पे हो सरकार की सना फ़क़त
शायर:
नज़्मी मियाँ मारहरवी
ना'त-ख़्वाँ:
ओवैस रज़ा क़ादरी
मनाज़िर हुसैन बदायूनी
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