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क्या शान पाई अल्लाहू अकबर

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क्या शान पाई अल्लाहू अकबर

क्या शान पाई अल्लाहू अकबर,
सिद्दिक ए अकबर, सिद्दीक ए अकबर।
सरकार के हो तुम खास दिलबर,
सिद्दिक ए अकबर, सिद्दीक ए अकबर।

तुम ही तो ठहरे पहले खलिफा,
हर एक सहाबी है काईल तुम्हारा,
फारूक हो या उस्मानो हैदर,
सिद्दिक ए अकबर, सिद्दीक ए अकबर।


हर वक़्त आक़ा के साथ रहते,
सफ़रो हज़र में बाज़ारों घर,
अब भी लहद में उनके बराबर,
सिद्दिक ए अकबर, सिद्दीक ए अकबर।

कैसी है रौनक उस्मां उमर भी,
दरबार में है हाज़िर अली भी,
करते हैं बैअत शब्बीरो शब्बर,
सिद्दिक ए अकबर, सिद्दीक ए अकबर।

हो एक पल्ला में ईमान इनका,
और दूसरे में ईमान सबका,
हर एक मोमिन से ईमां में बरतर,
सिद्दिक ए अकबर, सिद्दीक ए अकबर।

गुस्तखी करते हैं शैखैन की जो,
चेहरे बिगड़ते हैं उन काफिरों के,
अल्लाहू अकबर ये कुदरत ये तेवर,
सिद्दिक ए अकबर, सिद्दीक ए अकबर।


असहाब के गुण गाते रहेंगे,
इज़्ज़त पे पहरा देते रहेंगे,
हम भी उजागर खादिम हैं नौकर,
सिद्दिक ए अकबर, सिद्दीक ए अकबर।

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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