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लहू का कतरा कतरा बहा देंगे कसम से

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लहू का कतरा कतरा बहा देंगे कसम से
लहू का कतरा कतरा बहा देंगे कसम से
नबी पे जान अपनी लुटा देंगे कसम से

मुस्तफा की शान पे न आंच आने देंगे हम
बा-खुदा सहना पड़ा जो भी हमें सेह लेंगे हम
गुलामे मुस्तफा हैं बता देंगे कसम से
नबी पे जान अपनी लुटा देंगे कसम से

मुस्तफा के दुश्मनों को खून में नहलाएंगे
हर तरफ से काफिरों पे मौत बांके आएंगे
सबक हम मुन्किरों को सीखा देंगे कसम से
नबी पे जान अपनी लुटा देंगे कसम से

ज़िंदगानी में फकत है आप से ही रोशनी
थे अँधेरे ही अँधेरे आप ने दी रोशनी
शहादत के दिए हम जला देंगे कसम से
नबी पे जान अपनी लुटा देंगे कसम से

मौत से क्या खौफ हमको है कफ़न से दोस्ती
है सदा-इ-हक़ लबों पे है गुलामाने नबी
निशान तुम्हारे सारे मिटा देंगे कसम से
नबी पे जान अपनी लुटा देंगे कसम से

दौलते ईमान से सीने चमकते हैं सुनो
हम से न उलझो नबी के दीं के अये दुश्मनों
रक्खोगे याद ऐसी सजा देंगे कसम से
नबी पे जान अपनी लुटा देंगे कसम से

सब्ज़ गुम्बद के ख्यालों में हमें गुम रहने दो
साये में अम्नो अमां के दुश्मनों तुम रहने दो
नहीं तो बिजलियाँ हम गिरा देंगे कसम से
नबी पे जान अपनी लुटा देंगे कसम से

ज़िन्दगी में हर गड़ी ये आरज़ू मेहरान हो
दम जो निकले सामने तो साहिबे क़ुरआन हो
नज़अ के वक़्त पलकें बिछा देंगे कसम से
नबी पे जान अपनी लुटा देंगे कसम से
Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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