मैं क्या हूँ हर कोई शैदा है आ'ला हज़रत का
जिधर भी देखिए जल्वा है आ'ला हज़रत का
मैं क्या हूँ हर कोई शैदा है आ'ला हज़रत का
अदब नबी का सिखाया है आ'ला हज़रत ने
कि जाम-ए-'इश्क़ पिलाया है आ'ला हज़रत ने
तभी तो हर तरफ़ ना'रा है आ'ला हज़रत का
मैं क्या हूँ हर कोई शैदा है आ'ला हज़रत का
गुज़ारा हक़ के लिए आप ने है हर लम्हा
तमाम 'उम्र 'अक़ीदे पे है दिया पहरा
बहार-ए-सुन्नियत सदक़ा है आ'ला हज़रत का
मैं क्या हूँ हर कोई शैदा है आ'ला हज़रत का
मिली वो शान नबी से उन्हें ज़रा सोचो
वफ़ात पाए सदी इक गुज़र गई उन को
दिलों पे आज भी क़ब्ज़ा है आ'ला हज़रत का
मैं क्या हूँ हर कोई शैदा है आ'ला हज़रत का
चराग़ हो गए गुल उन से जलने वालों के
हैं नाम ज़िंदा वफ़ा उन से करने वालों के
सनद बुलंदी की रस्ता है आ'ला हज़रत का
मैं क्या हूँ हर कोई शैदा है आ'ला हज़रत का
ब-रोज़-ए-हश्र जो पूछेगा मुझ से मेरा ख़ुदा
बता क्या लाया है, आल-ए-रसूल ! तू तोहफ़ा
ज़बाँ पे नाम तब आएगा आ'ला हज़रत का
मैं क्या हूँ हर कोई शैदा है आ'ला हज़रत का
हो फ़िक्र-ए-हश्र क्यूँ ? किस बात का हो डर, 'आसिम !
है उन का दस्त-ए-करम मेरे काँधे पर, 'आसिम !
करम है ग़ौस का, साया है आ'ला हज़रत का
मैं क्या हूँ हर कोई शैदा है आ'ला हज़रत का
शायर:
मुहम्मद आसिम-उल-क़ादरी मुरादाबादी
ना'त-ख़्वाँ:
फ़रहान अली क़ादरी
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