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मैं तो उम्मती हूँ, ए शाह-ए-उमम !

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मैं तो उम्मती हूँ, ए शाह-ए-उमम !

मैं तो उम्मती हूँ, ए शाह-ए-उमम !
कर दे मेरे आक़ा ! अब नज़र-ए-करम
मैं तो बे-सहारा हूँ, दामन भी है ख़ाली
नबियों के नबी ! तेरी शान है निराली

मैं तो उम्मती हूँ, ए शाह-ए-उमम !
कर दे मेरे आक़ा ! अब नज़र-ए-करम


ग़म के अँधेरों ने यूँ गेरा हुवा है
आक़ा ! दुश्वार अब जीना मेरा हुवा है
बिगड़ी बना दो मेरी, तयबा के वाली !
नबियों के नबी ! तेरी शान है निराली

मैं तो उम्मती हूँ, ए शाह-ए-उमम !
कर दे मेरे आक़ा ! अब नज़र-ए-करम

जिस को बुलाया गया, वो ही अर्श-ए-बरीं है
आप के सिवा ऐसा कोई नहीं है
जिस की न बात कोई रब ने भी टाली
नबियों के नबी ! तेरी शान है निराली

मैं तो उम्मती हूँ, ए शाह-ए-उमम !
कर दे मेरे आक़ा ! अब नज़र-ए-करम


नात-ख़्वाँ:

जुनैद जमशेद

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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