मंज़र फ़िज़ा-ए-दहर में सारा 'अली का है
जिस सिम्त देखता हूँ नज़ारा 'अली का है
कुल का जमाल जुज़्व के चेहरे से है 'अयाँ
घोड़े पे है हुसैन नज़ारा 'अली का है
मरहब दो-नीम है ज़ेर-ए-मक़्तल पड़ा हुआ
उठने का अब नहीं के ये मारा 'अली का है
तुम दख़्ल दे रहे हो अक़ीदत के बाब में
देखो मा'मला ये हमारा 'अली का है
तू क्या है और क्या है तेरे 'इल्म की बिसात
तुझ पे करम नसीर ये सारा 'अली का है
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