बारहवीं का नूर दिल पे छा गया
आ गए नबी, आ गए नबी
अस्सलामु 'अलैका या मुस्तफ़ा !
अस्सलामु 'अलैका या मुस्तफ़ा !
मेरे सरकार आए, झूमो
मेरे दिलदार आए, झूमो
मेरे सरदार आए, झूमो
मेरे ग़म-ख़्वार आए, झूमो
सरकार की आमद ! मरहबा !
दिलदार की आमद ! मरहबा !
ग़म-ख़्वार की आमद ! मरहबा !
मंठार की आमद ! मरहबा !
अव्वल की आमद ! मरहबा !
आख़िर की आमद ! मरहबा !
सरवर की आमद ! मरहबा !
दिलबर की आमद ! मरहबा !
आ गए नबी, आ गए नबी
मेरे आक़ा आए हैं, सज गया ज़माना है
मेरे आक़ा आए हैं, सज गया ज़माना है
महकी महकी हैं गलियाँ, रंग क्यूँ सुहाना है ?
रहमतों का क्यूँ सर पे आज शामियाना है ?
मरहबा का हर लब पर आज क्यूँ तराना है ?
मेरे आक़ा आए हैं, सज गया ज़माना है
मेरे आक़ा आए हैं, सज गया ज़माना है
आमिना के प्यारे का जश्न हम मनाएँगे
झंडे भी लगाएँगे, घर को भी सजाएँगे
नग़्मा उन की आमद का झूम कर सुनाएँगे
जश्न है शह-ए-दीं का सब को ये बताना है
मेरे आक़ा आए हैं, सज गया ज़माना है
मेरे आक़ा आए हैं, सज गया ज़माना है
उन के आने से पहले ज़ुल्म हर-सू होता था
आह ! बेटियाँ प्यारी दफ़्न होती थीं ज़िंदा
रो रही थी हर बेवा, थे यतीम अफ़्सुर्दा
मिट गया जो आए वो दौर ज़ालिमाना है
मेरे आक़ा आए हैं, सज गया ज़माना है
मेरे आक़ा आए हैं, सज गया ज़माना है
जश्न है ये उन का जो चाँद के करें टुकड़े
शान वो मिली रब से, पेड़ भी करें सज्दे
वो जो चाहें, सूरज भी डूब कर पलट आए
रब से मर्तबा पाया आप ने यगाना है
मेरे आक़ा आए हैं, सज गया ज़माना है
मेरे आक़ा आए हैं, सज गया ज़माना है
बारहवीं का नूर दिल पे छा गया
आ गए नबी, आ गए नबी
सरकार की आमद ! मरहबा !
दिलदार की आमद ! मरहबा !
ग़म-ख़्वार की आमद ! मरहबा !
मंठार की आमद ! मरहबा !
अव्वल की आमद ! मरहबा !
आख़िर की आमद ! मरहबा !
सरवर की आमद ! मरहबा !
दिलबर की आमद ! मरहबा !
आए बज़्म-ए-'आलम में रहमत-ए-ख़ुदा बन कर
बे-सहारों, मज़लूमों का वो आसरा बन कर
दर्दमंदों के हक़ में बा'इस-ए-शिफ़ा बन कर
वो कि जिन को बिन देखे हर कोई दीवाना है
मेरे आक़ा आए हैं, सज गया ज़माना है
मेरे आक़ा आए हैं, सज गया ज़माना है
आमिना की गोदी में आए जब मेरे आक़ा
आसमाँ से तारे भी लेने आए थे सदक़ा
देख कर के का'बा भी उन को वज्द में आया
ज़िक्र उन की आमद का किस-क़दर सुहाना है
मेरे आक़ा आए हैं, सज गया ज़माना है
मेरे आक़ा आए हैं, सज गया ज़माना है
मुस्तफ़ा के सदक़े ही ये जहाँ बना, 'आसिम !
ज़िंदगी भी है पाई, दीन-ए-हक़ मिला, 'आसिम !
माल क्या है ! आक़ा पर जान भी फ़िदा, 'आसिम !
जब तलक है जाँ बाक़ी, जश्न ये मनाना है
मेरे आक़ा आए हैं, सज गया ज़माना है
मेरे आक़ा आए हैं, सज गया ज़माना है
शायर:
मुहम्मद आसिम-उल-क़ादरी मुरादाबादी
ना'त-ख़्वाँ:
ज़ोहैब अशरफ़ी
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