मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !
मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !
नसीब चमके हैं फ़र्शियों के, कि 'अर्श के चाँद आ रहे हैं
झलक से जिन की फ़लक है रौशन, वो शम्स तशरीफ़ ला रहे हैं
मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !
मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !
निसार तेरी चहल-पहल पे हज़ारों 'ईदें रबी-'उल-अव्वल
सिवाए इब्लिस के जहाँ में सभी तो ख़ुशियाँ मना रहे हैं
मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !
मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !
शब-ए-विलादत में सब मुसलमाँ, न क्यूँ करें जान-ओ-माल क़ुर्बां !
अबू लहब जैसे सख़्त क़ाफ़िर ख़ुशी में जब फ़ैज़ पा रहे हैं
मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !
मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !
ज़माने भर में ये क़ा'इदा है कि जिस का खाना उसी का गाना
तो ने'मतें जिन की खा रहे हैं, उन्हीं के हम गीत गा रहे हैं
मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !
मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !
जो क़ब्र में उन को अपनी पाऊँ, पकड़ के दामन मचल ही जाऊँ
जो दिल में रह के छुपे थे मुझ से, वो आज जल्वा दिखा रहे हैं
मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !
मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !
मैं तेरे सदक़े, ज़मीन-ए-तयबा ! फ़िदा न हो तुझ पे क्यूँ ज़माना
कि जिन की ख़ातिर बने ज़माने, वो तुझ में आराम पा रहे हैं
मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !
मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !
ना'त-ख़्वाँ:
मीलाद रज़ा क़ादरी
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