मेरी बात बन गई है तेरी बात करते करते,
तेरे शहर में मैं आऊँ तेरी ना’त पढ़ते पढ़ते।
तेरे ‘इश्क़ की बदौलत मुझे ज़िंदगी मिली है,
मुझे मौत आए, आक़ा ! तेरा ज़िक्र करते करते।
मेरे सूने सूने घर में कभी रौनक़ें ‘अता हों,
मैं दीवाना हो ही जाऊँ तेरी राह तकते तकते।
किसी चीज़ की तलब है न है आरज़ू भी कोई,
तूने इतना भर दिया है कश्कोल भरते भरते।
है जो ज़िंदगानी बाक़ी, ये इरादा कर लिया है,
तेरे मुन्किरों से, आक़ा ! मैं मरूँगा लड़ते लड़ते।
मेरी ऐसी हाज़री हो कि कभी न वापसी हो,
मिले सदक़ा पंज-तन का तेरी ना’त पढ़ते पढ़ते।
नासिर की हाज़री हो कभी आस्ताँ पे तेरे,
कि ज़माना हो गया है मुझे आहें भरते भरते।
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