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मेरी बात बन गई है तेरी बात करते करते

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मेरी बात बन गई है तेरी बात करते करते

मेरी बात बन गई है तेरी बात करते करते,

तेरे शहर में मैं आऊँ तेरी ना’त पढ़ते पढ़ते।

 

तेरे ‘इश्क़ की बदौलत मुझे ज़िंदगी मिली है,

मुझे मौत आए, आक़ा ! तेरा ज़िक्र करते करते।

 

मेरे सूने सूने घर में कभी रौनक़ें ‘अता हों,

मैं दीवाना हो ही जाऊँ तेरी राह तकते तकते।

 

किसी चीज़ की तलब है न है आरज़ू भी कोई,

तूने इतना भर दिया है कश्कोल भरते भरते।

 

है जो ज़िंदगानी बाक़ी, ये इरादा कर लिया है,

तेरे मुन्किरों से, आक़ा ! मैं मरूँगा लड़ते लड़ते।

 

मेरी ऐसी हाज़री हो कि कभी न वापसी हो,

मिले सदक़ा पंज-तन का तेरी ना’त पढ़ते पढ़ते।


नासिर की हाज़री हो कभी आस्ताँ पे तेरे,

कि ज़माना हो गया है मुझे आहें भरते भरते।

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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