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मेरी उल्फत मदीने से यूँ ही नहीं

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मेरी उल्फत मदीने से यूँ ही नहीं

मेरी उल्फत मदीने से यूँ ही नहीं,
मेरे आक़ा का रोज़ा मदीने में है।


मैं मदीने की जानिब न कैसे खींचूं,
मेरा दीन और दुनिया मदीने में है,


फ़िर मुझे मौत का कोई ख़तरा न हो,
मौत क्या ज़िंदगी की भी परवा न हो,


काश ! इक बार सरकार मुझ से कहें,
अब तेरा जीना-मरना मदीने में है।

 

अर्श-ए-आज़म से जिस की बड़ी शान है,
रोज़ा-ए-मुस्तफा जिस की पहचान है,


जिस का हम-पल्ला कोई मोहल्ला नहीं,
एक ऐसा मोहल्ला मदीने में है।

 

सरवर-ए-दो-जहाँ ! से दुआ है मेरी,
हां ! यही चश्म-ए-तर इल्तेजा है मेरी,
उन की फेहरिस्त में मेरा भी नाम हो,
जिन का रोज़ आना-जाना मदीने में है।

 

जब नज़र सू-ए-तयबा रवाना हुई,
साथ दिल भी गया, साथ जां भी गई,
मैं मुनीर अब रहूँगा यहाँ किस लिए !
मेरा सारा असासा मदीने में है।

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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