भाषा:

खोजें

नारे दोज़ख़ को चमन कर दे बहारे आ़रिज़

  • यह साझा करें:
नारे दोज़ख़ को चमन कर दे बहारे आ़रिज़

नारे दोज़ख़ को चमन कर दे बहारे आ़रिज़

ज़ुल्मते ह़श्र को दिन कर दे नहारे आ़रिज़


मैं तो क्या चीज़ हूं खुद साह़िबे कुरआं को शहा

लाख मुस्ह़फ़ से पसंद आई बहारे आ़रिज़


जैसे कुरआन है विर्द उस गुले मह़बूबी का

यूं ही कुरआं का वज़ीफ़ा है, वक़ारे आ़रिज


गर्चे कुरआं है, न कुरआं की बराबर लेकिन
कुछ तो है जिस पे है वोह मद्ह निगारे आ़रिज़


त़ूर क्या अ़र्श जले देख के वोह जल्व-ए-गर्म

आप आ़रिज़ हो मगर आईना-दारे आ़रिज़


त़ुरफ़ा आलम है वोह कुरआन इधर, देखें उधर

मुस्ह़फ़े पाक हो ह़ैराने बहारे आ़रिज़


तरजमा है यह सिफ़त का वोह खुद आईन-ए ज़ात,

क्यूँ न मुस्ह़फ़ से जि़यादा हो वक़ारे आ़रिज़


जल्वा फ़रमाएं रुख़े दिल की सियाही मिट जाए,

सुब्ह़ हो जाए इलाही शबे तारे आ़रिज़

 

नामे ह़क़ पर करे मह़बूब दिलो जां कुरबां,
ह़क़ करे अ़र्श से ता फ़र्श निसारे आ़रिज़


मुश्क बू, जुल्फ़ से रुख़, चेहरे से बालों में शुआ़अ

मो’जिज़ा है हलब-ए जुल्फ़ो ततारे आ़रिज़

 

ह़क़ ने बख़्शा है करम, नज़रे गदायां हो क़बूल

प्यारे इक दिल है वोह करते हैं निसारे आ़रिज़


आह बे मायगी-ए दिल कि रज़ाए मौह़ताज

ले कर इक जान चला बहरे निसारे आ़रिज़

 

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

एक टिप्पणी छोड़ें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा। आवश्यक फ़ील्ड * से चिह्नित हैं

Your experience on this site will be improved by allowing cookies Cookie Policy