नज़र पे किसी की नज़र हो रही है
मेरी चश्म कान-ए-गौहर हो रही है
मेरे ख़ुफ़िया नालों को वो सुन रहे हैं
'इनायत किसी की किधर हो रही है
वो तैबा में मुझको तलब कर रहे हैं
तलब मेरी अब मो'तबर हो रही है
मदीने में हूँ और पिछला पहर है
शब्-ए-ज़िन्दगी की सहर हो रही है
कोई शब् नहीं है ज़माने में ऐसी
शब्-ए-तैबा रश्क़-ए-कमर हो रही है
हुआ तालिब-ए-तैबा , मतलूब-ए-तैबा
तलब तेरी अये मुन्तज़िर हो रही है
नयी ज़िन्दगी की वो मेह दे रहे हैं
मेरी ज़िंदगानी अमर हो रही है
गुज़ारा है जिस दर से दोनों जहां का
उसी दर पे अपनी गुज़र हो रही है
मदीने से मेरी बला जाए अख़्तर
मेरी ज़िन्दगी वक़्फ़-ए-दर हो रही है
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