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रबीउन्नूर उम्मीदों की दुनिया साथ ले आया | रबी-उल-अव्वल उम्मीदों की दुनिया साथ ले आया

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रबीउन्नूर उम्मीदों की दुनिया साथ ले आया | रबी-उल-अव्वल उम्मीदों की दुनिया साथ ले आया

रबी'उन्नूर उम्मीदों की दुनिया साथ ले आया
दु'आओं की क़ुबूलियत को हाथों हाथ ले आया

रबी'-उल-अव्वल उम्मीदों की दुनिया साथ ले आया
दु'आओं की क़ुबूलियत को हाथों हाथ ले आया

ख़ुदा ने ना-ख़ुदाई की ख़ुद इंसानी सफ़ीने की
कि रहमत बन के छाई बारहवीं शब इस महीने की

अज़ल के रोज़ जिस की धूम थी वो आज की शब है
जो क़िस्मत के लिए मक़्सूम थी वो आज की शब है

जहाँ में जश्न-ए-सुब्ह-ए-'ईद का सामान होता था
उधर शैतान कितना अपनी नाकामी पे रोता था

ब-हर-सू नग़्मा-ए-सल्ले-'अला गूँजा फ़ज़ाओं में
ख़ुशी ने ज़िंदगी की रूह दौड़ा दी हवाओं में

सदा हातिफ़ ने दी, ऐ साकिनान-ए-ख़ित्ता-ए-हस्ती !
हुई जाती है फिर आबाद ये उजड़ी हुई बस्ती

अभी जिब्रील उतरे भी न थे का'बे के मिम्बर से
कि इतने में सदा आई ये अब्दुल्लाह के घर से

ब-सद अंदाज़-ए-यकताई, ब-ग़ायत शान-ए-ज़ेबाई
अमीं बन कर अमानत आमिना की गोद में आई

फ़रिश्तों की सलामी देने वाली फ़ौज गाती थी
जनाब-ए-आमिना सुनती तो ये आवाज़ आती थी

मुबारक हो हबीब-ए-किब्रिया तशरीफ़ लाते हैं
मुबारक हो मुहम्मद मुस्तफ़ा तशरीफ़ लाते हैं

मुबारक मुर्सलीं के पेशवा तशरीफ़ लाते हैं
मुबारक हो कि ख़त्मुल-अंबिया तशरीफ़ लाते हैं

मुबारक हो शह-ए-हर-दो-सरा तशरीफ़ लाते हैं
मुबारक 'आसियों के आसरा तशरीफ़ लाते हैं

मुबारकबाद है उन के लिए जो ज़ुल्म सहते हैं
कहीं जिन को अमाँ मिलती नहीं, बर्बाद रहते हैं

मुबारकबाद बेवाओं की हसरत-ज़ा निगाहों को
असर बख़्शा गया नालों को, फ़रियादों को, आहों को

ज़'ईफ़ों, बेकसों, आफ़त-नसीबों को मुबारक हो
यतीमों को, ग़ुलामों को, ग़रीबों को मुबारक हो

मुबारक हो कि दौर-ए-राहत-ओ-आराम आ पहुँचा
नजात-ए-दाइमी की शक्ल में इस्लाम आ पहुँचा

मुबारक हो कि ख़त्म-उल-मुर्सलीं तशरीफ़ ले आए
जनाब-ए-रहमतुल-लिल-'आलमीं तशरीफ़ ले आए

सलाम, ऐ आमिना के ला'ल, ऐ महबूब-ए-सुब्हानी !
सलाम, ऐ फ़ख़्र-ए-मौजूदात, फ़ख़्र-ए-नौ'-ए-इंसानी !

सलाम, ऐ आतिश-ए-ज़ंजीर-ए-बातिल तोड़ने वाले !
सलाम, ऐ ख़ाक के टूटे हुए दिल जोड़ने वाले !

सलाम उन पर कि जिस ने गालियाँ सुन कर दु'आएँ दी
सलाम उन पर कि जिस ने बादशाही में फ़क़ीरी की

जहाँ तारीक था, ज़ुल्मत-कदा था, सख़्त काला था
कोई पर्दे से क्या निकला कि घर घर में उजाला था

ज़बाँ पर अश्रक़ल-बदरु 'अलैना की सदाएँ थीं
दिलों में मा द'आ लिल्लाहि दा'ई की दु'आएँ थीं

वो नन्हीं बच्चियाँ छतों पे चढ़ कर दफ़ बजाती थीं
रसूल-ए-पाक की जानिब इशारे कर के गाती थीं

कि हम हैं बच्चियाँ नज्जार के 'आली घराने की
ख़ुशी है आमिना के ला'ल के तशरीफ़ लाने की

मुबारक हो ! मुबारक हो ! मुबारक हो ! मुबारक हो !
मुबारक 'ईद-ए-मीलादुन्नबी का फिर पयाम आया

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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