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रुख से पर्दा अब अपने उठा दो

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रुख से पर्दा अब अपने उठा दो

रुख से पर्दा अब अपने उठा दो
जालियों पर निगाहें जमी हैं
अपना जलवा इसी में दिखा दो
जालियों पर निगाहें जमी हैं

फासलों को खुदारा मिटा दो
जालियों पर निगाहें जमी हैं
अपना जलवा इसी में दिखा दो
जालियों पर निगाहें जमी हैं

ग़ौस-उल-आ'ज़म हो ग़ौस-उल-वरा हो
नूर हो नूर-ए-सल्ले-अला हो
क्या बयान आपका मर्तबा हो
दस्तगिर और मुश्किल कुशा हो
आज दीदार अपना करा लो
जालियों पर निगाहें जमी हैं

सुन रहे हैं वो फरियाद मेरी
खाक होगी न बर्बाद मेरी
मैं कहीं भी मरूँ शाह-ए-जिलान
रूह पहुँचेगी बगदाद मेरी
मुझको परवाज़ के पर लगा दो
जालियों पर निगाहें जमी हैं

वज्द में आएगा सारा 'आलम
जब पुकारेंगे या ग़ौस-ए-आज़म
वो निकल आएंगे जालियों से
और कदमों में गिर जाएंगे हम
फिर कहेंगे के बिगड़ी बना दो
जालियों पर निगाहें जमी हैं

फिक्र देखो, ख्यालात देखो
ये अकीदत, ये जज़्बात देखो
मैं हूँ क्या, मेरी औकात देखो
सामने कैसी है ज़ात देखो
अपने सर को अदीब अब झुका दो
जालियों पर निगाहें जमी हैं

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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