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रूसुल उन्ही का तो मुज़्दा सुनाने आएं हैं

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रूसुल उन्ही का तो मुज़्दा सुनाने आएं हैं

रूसुल उन्ही का तो मुज़्दा सुनाने आएं हैं,
उन्ही के आने की खुशियां मनाने आएं हैं।


फरिश्तें आज तो धूमे मचाने आएं हैं,
उन्हीं के आने की शादी रचाने आएं हैं।


फलक के हूरो मलक गीत गाने आएं हैं,
के दोजहां में ये डंका बजाने आएं हैं।


ये सीधा रास्ता हक़ का बताने आएं हैं,
ये हक़ के बंदों को हक़ से मिलाने आएं हैं।


ये भूले भटकों को रस्ते पे लाने आएं हैं,
ये भूले भटकों को हादी बनाने आएं हैं।


खुदा ए पाक के जलवे दिखाने आएं हैं,
दिलों को नूर के बुकऐं बनाने आएं हैं।


ये क़ैद ओ बंद ए अलम से छुड़ाने आए हैं,
लो मुज़्दा‍ हो के रिहाई दिलाने आएं हैं।


चमक से अपनी जहां जगमगाने आएं हैं,
महक से अपनी ये कूचे बसाने आएं हैं।


नसीम ए फैज़ से गुंचे खिलाने आएं हैं,
करम की अपनी बहारें दिखाने आएं हैं।


यही तो सोते हुओ को जगाने आएं है,
यही तो रोते हूओ को हंसाने आएं हैं।


ये कुफ्र ओ शिर्क की नीवें हिलाने आएं हैं,
ये शिर्क ओ कुफ्र की तामीरें ढाने आएं हैं।


सहर को नूर जो चमका तो शाम को चमका,
बता दिया की जहां जगमगाने आएं है।


इन्हे खुदा ने किया अपने मुल्क का मालिक,
इन्ही के क़ब्ज़े में रब के ख़ज़ाने आएं हैं।


जो चाहेंगे जिसे चाहेंगे ये उसे देंगे,
करीम हैं ये ख़ज़ाने लुटाने आएं हैं।


जो गिर रहे थे उन्हे नाईबो ने थाम लिया,
जो गिर चुके थे उन्हे ये उठाने आएं हैं।


मसीह पाक ने अजसाम ए मुर्दा ज़िंदा किए,
ये जान ए जां दिलों जां को जिलाने आएं हैं।


बुलावा आप का अब तक दिया किए नाईब,
अब आप बंदों को अपने बुलाने आएं हैं।


रऊफ ऐसे हैं और ये रहीम हैं इतने,
के गिरते पड़तों को सीने लगाने आएं हैं।


सुनोगे “ला” न ज़बान ए पाक से नूरी,
ये फैज़ो जूद के दरिया बहाने आएं हैं।

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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