सर-ए-ला-मकाँ से तलब हुई
सू-ए-मुंतहा वो चले नबी
कोई हद है उन के 'उरूज की
बलग़ल-'उला बि-कमालिहि
बलग़ल-'उला बि-कमालिहि
कशफ़-द्दुजा बि-जमालिहि
हसुनत जमी'उ ख़िसालिहि
सल्लू 'अलैहि व आलिहि
वही ला-मकाँ के मकीं हुए
सर-ए-'अर्श तख़्त-नशीं हुए
वो नबी हैं जिस के हैं ये मकाँ
वो ख़ुदा है जिस का मकाँ नहीं
सर-ए-'अर्श पर है तेरी गुज़र
दिल-ए-फ़र्श पर है तेरी नज़र
मलकूत-मुल्क में कोई शय
नहीं वो जो तुझ पे अयाँ नहीं
वो ख़ुदा के नूर को देख कर
भी जहान वालों में आ गए
सर-ए-'अर्श जाना कमाल था
कि वहाँ से आना कमाल है
रुख़-ए-मुस्तफ़ा की ये रौशनी
ये तजल्लियों की हमाहमी
कि हर एक चीज़ चमक उठी
कशफ़-द्दुजा बि-जमालिहि
वो सरापा रहमत-ए-किब्रिया
कि हर इक पे उन का करम हुआ
ये कलाम-ए-पाक है बरमला
हसुनत जमी'उ ख़िसालिहि
ये कमाल-ए-ख़ुल्क़-ए-मुहम्मदी
कि हर इक पे चश्म-ए-करम रही
सर-ए-हश्र ना'रा-ए-उम्मती
हसुनत जमी'उ ख़िसालिहि
वही हक़-निगर, वही हक़-नुमा
रुख़-ए-मुस्तफ़ा है वो आईना
कि ख़ुदा-ए-पाक ने ख़ुद कहा
सल्लू 'अलैहि व आलिहि
मेरा दीन, 'अंबर-ए-वारसी !
ब-ख़ुदा है 'इश्क़-ए-मुहम्मदी
मेरा ज़िक्र-ओ-फ़िक्र है बस यही
सल्लू 'अलैहि व आलिहि
ऐ मज़हर-ए-नूर-ए-ख़ुदा !
बलग़ल-'उला बि-कमालिहि
मौला 'अली मुश्किल-कुशा
कशफ़-द्दुजा बि-जमालिहि
हसनैन जान-ए-फ़ातिमा
हसुनत जमी'उ ख़िसालिहि
या'नी मुहम्मद मुस्तफ़ा
सल्लू 'अलैहि व आलिहि
शायर:
अंबर वारसी
ना'त-ख़्वाँ:
ग़ुलाम फ़रीद साबरी
हाफ़िज़ अहमद रज़ा क़ादरी
राओ अली हसनैन
आयत आरिफ़
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