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सरे शाम ही से फलक के सितारे

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सरे शाम ही से फलक के सितारे

सरे शाम ही से फलक के सितारे

सरे शाम ही से फलक के सितारे
यही कह रहे हैं चमकते चमकते
दिखाएंगे शाम-ओ-कमर को भी आंखें
मदीने के ज़र्रे दमकते दमकते

अजब नाज़ुकी है अजब शौक़ियॉं हैं
यक़ीन-ओ-गुमान में फंसी तितलियां हैं
गुलों को भी ख़ुशबू की ख़ैरात बांटें
मदीने के कांटे महकते महकते

अए नमरूद! तुझको ख़बर ही नहीं है के
पुश्त-ए-खलीली में वो जलवागर है
यकायक बनेंगे वही बिस्तर-ए-गुल
अदावत के शोले लहकते लहकते

दर-ए-मुस्तफ़ा से मिली जिसको चिट्ठी
पुकारेगी उसको मदीने की मिट्टी
कहीं दफ़्न कर दो जनाज़े को लेकिन
वो पहुंचेगा तैबा खिसकते खिसकते

जो उम्मत के ग़म में छलकते हैं आंसू
उन्हीं से निकल आए बख़्शिश के पहलू
बुझाएगी महशर में दोज़ख़ की आतिश
वो चश्म-ए-रिसालत छलकते छलकते

ज़रा सूनी पलकों की क़िस्मत जगा दो
ज़रा ख़्वाब में अपना जलवा दिखा दो
शब-ए-ग़म के बिस्तर पे आशिक़ तुम्हारा
अभी सो गया है सिसकते सिसकते

मदीने की गलियों में जब घूमते हैं
यही सोच कर रहगुज़र चूमते हैं
चले जाएंगे हम इसी रास्ते से
बिहिश्त-ए-करम में लपकते लपकते

रज़ा से जलोगे तो जल जाओगे तुम
रज़ा से मिलोगे तो खिल जाओगे तुम
ये है आला हज़रत की उल्फ़त का सिक्का
जो चलता रहेगा खनकते खनकते

नबी की मोहब्बत का इनआम देखो
ये नात-ए-शाह-ए-दीन का इकराम देखो
असद भी है बाग़-ए-मदीना का बुलबुल
थकेगा न हरगिज़ चहकते चहकते

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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