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सरवरा शहा करीमा दस्तगीरा अशरफा

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सरवरा शहा करीमा दस्तगीरा अशरफा

सरवरा शहा करीमा दस्तगीरा अशरफा,
हुरमत-ए-रूह-ए-पयंबर यक नज़र कुन सुए-मा।

ऐ‌ शह-ए-सीमानानो-गौ़स-ए-आ़लमो-पीर-ए-हुदा,
साहिब-ए-फ़ज़लो-अ़ता सर चश्मा-ए-जूदो शखा़,
तेरे दर पर तेरा मंगता दस्त-बस्ता है खड़ा,
लाज रख ले मेरे दाता मेरे खाली हाथ का।

सरवारा शाहा करीमा दस्तगीरा अशरफा,
हुरमत-ए-रूह-ए-पयंबर याक नज़र कुन सुए-मा।

क़ुब्बा-ए-बैज़ा फ़लक रिफअत है और मेहराबो-माह,
देखते हैं टोपीया थामे सभी मोहताज-ओ-शाह,
आस्ताना क़सरे जन्नत से फुज़ुं रखता है जाह,
हां दिखा‌ दे जलवा-ए-जे़बा भी अब बहर-ए-इलाह।

 

सरवारा शाहा करीमा दस्तगीरा अशरफा,
हुरमत-ए-रूह-ए-पयंबर याक नज़र कुन सुए-मा।

शहर-ए-यार-ए-औलिया ऐ‌ साहिब-ए-इज़्ज़ो-वका़र,
ऐ गु़ल-ए-बाग़-ए-विलायत दोनों आ़लम की बहार,
हो ख़जा़ने ग़म के हाथों आज कल ज़ारो नज़ार,
तेरी चौखट पर खड़ा हूं हाथ बांधे अश्क-बार।

सरवारा शाहा करीमा दस्तगीरा अशरफा,
हुरमत-ए-रूह-ए-पयंबर याक नज़र कुन सु-ए-मा।

एक तरिक़े पर नहीं रहता कभी दुनिया का हाल,
हर कमाल-ए-राज़-ओ-वाल-ओ-हर ज़वाल-ए-राकमाल,
कट गई फु़र्कत की रातें अब तो हो रोज़-ए-विसाल,
हां निकल ऐ आफताब-ए-हुस्न अय माह्र-ए-जमाल।

सरवारा शाहा करीमा दस्तगीरा अशरफा,
हुरमत-ए-रूह-ए-पयंबर याक नज़र कुन सु-ए-मा।

आ गए हैं अब अ़दावत पर बहुत अहल-ए-ज़मन,
एक मैं हूं न-तवां और लाख हैं रंजो-महन,
सैय्यद-ए-मोहताज की सुन लो बराए पंजतन,
बोल बाला हो तेरा आबाद तेरी अंजुमन।

सरवारा शाहा करीमा दस्तगीरा अशरफा,
हुरमत-ए-रूह-ए-पयंबर याक नज़र कुन सुए-मा।

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Mohammad Wasim

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