सुनो हमारे दिलों की सदा अता-ए-रसूल।
करम हो हम पे भी, ख्वाजा पिया बरा-ए-रसूल।
फिर एक बार बना दो मुसाफिर-ए-ताइबा,
खुदा के वास्ते, कर दो अता लिका-ए-रसूल।
मोईनुद्दीन हो सुल्तान-ए-हिंद गरीब नवाज,
नहीं है तुमसा कोई दूसरा, अता-ए-रसूल।
तुम्हारा नक्शे क़दम, रहनुमाए जन्नत है,
तुम्हारे सदक़े में, हमको मिला है पाए-रसूल।
नबी ने क़ुत्ब-ए-मशा एक बना दिया तुमको,
हमें भी कर दो करम से, अता विलाए-रसूल।
क़रोड़ों दिल मुनव्वर हुए हैं ईमान से,
तुमहीं से हिंद में फैली शाहां-ए-रसूल।
हुज़ूर दीन का ख़ादिम बना दो रजवान को,
बनें ये आशिक-ए-गौस ओ रज़ा, ग़दा-ए-रसूल।
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