दुरूदों की शम्मा' लबों पर सजाओ
अँधेरा मिटाने हुज़ूर आ रहे हैं
उठो, सुन्नियो ! अपने दामन को भर लो
मुक़द्दर जगाने हुज़ूर आ रहे हैं
ज़रा पढ़ के सल्ले-'अला या मुहम्मद
घरों को सजाओ हुज़ूर आ रहे हैं
दिल-ओ-जान कर दो सब उन के हवाले
कि पलकें बिछाओ हुज़ूर आ रहे हैं
सुहानी घड़ी और पिछला पहर है
तबस्सुम-ब-दामा वो देखो क़मर है
मदीने के ज़र्रो ! सितारों से कहना
ज़रा जगमगाओ हुज़ूर आ रहे हैं
हिरन क़ैद में रह के इठला रही थी
ये कह कह के बच्चों से बलखा रही थी
मेरे प्यारे बच्चो ! चलो मुस्कुराओ
कि हम को छुड़ाने हुज़ूर आ रहे हैं
मु'अत्तर मु'अत्तर फ़िज़ा हो रही है
ज़रूर आमद-ए-मुस्तफ़ा हो रही है
दुरूदों दु'आओं को पढ़ कर के, लोगो !
मुक़द्दर जगाओ हुज़ूर आ रहे हैं
ना'त-ख़्वाँ:
अरशद इक़बाल अशरफ़ी
शुऐब रज़ा वारसी भदोही
महमूद रज़ा मुरादाबादी
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