तुमने शह-ए-जिलान ! मुझे बग़दाद बुलाया
यूँ मेरे मुक़द्दर को शहा ! तुमने जगाया
देखूं तेरा दरबार में , मेरी थी ये तमन्ना
मुद्दत का मेरे दिल का ये अरमान बराया
हो शुक्र अदा कैसे तुम्हारा शह-ए-जिलान !
मुज पापी को दरबार का दीदार कराया
हाँ ! हाँ ! तुम्हें मालूम है क्या चाहिए मुझको
या गौस ! करम कर बड़ी दूर से आया
हर आरज़ू बर आये उबैद-ए-रज़वी की
ये अर्ज़ लिए आक़ा कराची से में आया
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