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उनका मंगता हूं जो मंगता नहीं होने देते

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उनका मंगता हूं जो मंगता नहीं होने देते

उनका मंगता हूं जो मंगता नहीं होने देते,

ये हवाले मुझे रुसवा नहीं होने देते।

 

मेरे हर ऐब की करते हैं वो पर्दा पोशी,

मेरे जुर्मों का तमाशा नहीं होने देते।

 

नात पढ़ता हूं तो आती है महक तैयबा से,

मेरे लहजे को वो मैला नहीं होने देते।

 

अपने मंगतो की वो फेहरिस्त में रखते हैं मुझे,

मुझको मोहताज किसी का नहीं होने देते।

 

है ये ईमान के आयेंगे लहद में मेरी,

अपने बंदों को वो तन्हा नहीं होने देते।

 

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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