भाषा:

खोजें

वो नबियों में रहमत लक़ब पाने वाला

  • यह साझा करें:
वो नबियों में रहमत लक़ब पाने वाला

वो नबियों में रहमत लक़ब पाने वाला

उसी से है इस्लाम का बोल-बाला

वो सर-चश्मा-ए-नूर-ए-फ़त्ह-ए-मुबीं है

वोही मश'अल-ए-राह-ए-'अज़्म-ओ-यक़ीं है

उसी से हमारे दिलों में उजाला

उसी से है इस्लाम का बोल-बाला

वो नबियों में रहमत लक़ब पाने वाला

उसी से है इस्लाम का बोल-बाला

उसी के ये हम पर हैं एहसान सारे

क़दम मंज़िलें चूमती हैं हमारे

उसी ने अँधेरों से हम को निकाला

उसी से है इस्लाम का बोल-बाला

वो नबियों में रहमत लक़ब पाने वाला

उसी से है इस्लाम का बोल-बाला

सहारा दिया उस के नक़्श-ए-क़दम ने

उसी की तवज्जोह, उसी के करम ने

ज़माने के गिरते हुओं को सँभाला

उसी से है इस्लाम का बोल-बाला

वो नबियों में रहमत लक़ब पाने वाला

उसी से है इस्लाम का बोल-बाला

उसी की मोहब्बत है ईमान-ए-कामिल

उसी से मिला हम को 'इरफ़ान-ए-मंज़िल

उसी ने हमें जादा-ए-हक़ पे डाला

उसी से है इस्लाम का बोल-बाला

वो नबियों में रहमत लक़ब पाने वाला

उसी से है इस्लाम का बोल-बाला

 

ना'त-ख़्वाँ:

क़ारी वहीद ज़फ़र क़ासमी

मुदस्सिर अब्दुल्लाह

 

वो नबियों में रहमत लक़ब पाने वाला

मुरादें ग़रीबों की बर लाने वाला

मुसीबत में ग़ैरों के काम आने वाला

वो अपने पराए का ग़म खाने वाला

फ़क़ीरों का मलजा, ज़'ईफ़ों का मावा

यतीमों का वाली, ग़ुलामों का मौला

ख़ता-कार से दरगुज़र करने वाला

बद-अंदेश के दिल में घर करने वाला

मफ़ासिद को ज़ेर-ओ-ज़बर करने वाला

क़बाइल को शीर-ओ-शकर करने वाला

उतर कर हिरा से सू-ए-क़ौम आया

और इक नुस्ख़ा-ए-कीमिया साथ लाया

मस-ए-ख़ाम को जिस ने कुंदन बनाया

खरा और खोटा अलग कर दिखाया

'अरब जिस पे क़रनों से था जहल छाया

पलट दी बस इक आन में उस की काया

रहा डर न बेड़े को मौज-ए-बला का

इधर से उधर फिर गया रुख़ हवा का

वो फ़ख़्र-ए-'अरब, ज़ेब-ए-मेहराब-ओ-मिम्बर

तमाम अहल-ए-मक्का को हमराह ले कर

गया एक दिन हस्ब-ए-फ़रमान-ए-दावर

सू-ए-दश्त और चढ़ के कोह-ए-सफ़ा पर

ये फ़रमाया सब से कि, ऐ आल-ए-ग़ालिब !

समझते हो तुम मुझ को सादिक़ कि काज़िब ?

कहा सब ने, क़ौल आज तक कोई तेरा

कभी हम ने झूटा सुना और न देखा

कहा, गर समझते हो तुम मुझ को ऐसा

तो बावर करोगे अगर मैं कहूँगा ?

कि फ़ौज-ए-गिराँ पुश्त-ए-कोह-ए-सफ़ा पर

पड़ी है कि लूटे तुम्हें घात पा कर

कहा, तेरी हर बात का यूँ यक़ीं है

कि बचपन से सादिक़ है तू और अमीं है

कहा, गर मेरी बात ये दिल-नशीं है

तो सुन लो ख़िलाफ़ इस में इस्लाह नहीं है

कि सब क़ाफ़िला याँ से है जाने वाला

डरो उस से जो वक़्त है आने वाला

बलग़ल-'उला बि-कमालिही

कशफ़-द्दुजा बि-जमालिही

हसुनत जमी'उ ख़िसालिही

सल्लू 'अलैहि व आलिही

वो बिजली का कड़का था या सौत-ए-हादी

'अरब की ज़मीं जिस ने सारी हिला दी

नई इक लगन दिल में सब के लगा दी

इक आवाज़ में सोती बस्ती जगा दी

पड़ा हर तरफ़ ग़ुल ये पैग़ाम-ए-हक़ से

कि गूँज उठे दश्त-ओ-जबल नाम-ए-हक़ से

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

एक टिप्पणी छोड़ें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा। आवश्यक फ़ील्ड * से चिह्नित हैं

Your experience on this site will be improved by allowing cookies Cookie Policy