मेरे आक़ा-ओ-मौला ! सरकार आ'ला हज़रत !
मेरे आक़ा-ओ-मौला ! सरकार आ'ला हज़रत !
लाख जलते रहें दुश्मनान-ए-रज़ा
कम न होंगे कभी मद्ह-ख़्वान-ए-रज़ा
कह रहे हैं सभी 'आशिक़ान-ए-रज़ा
मस्लक-ए-आ'ला-हज़रत सलामत रहे
वाह ! क्या बात आ'ला हज़रत की !
वाह ! क्या बात आ'ला हज़रत की !
मैं हूँ सुन्नी, मेरा दिल है दीवाना आ'ला हज़रत का
मेरा मर्कज़ बना है आस्ताना आ'ला हज़रत का
नबी के 'इश्क़ में क़ुर्बान कर दी ज़िंदगी जिस ने
ज़माना जानता है 'आशिक़ाना आ'ला हज़रत का
वाह ! क्या बात आ'ला हज़रत की !
वाह ! क्या बात आ'ला हज़रत की !
रोज़-ए-महशर अगर मुझ से पूछे ख़ुदा
बोल आल-ए-रसूल तू लाया है क्या ?
अर्ज़ कर दूँगा, लाया हूँ अहमद रज़ा
या ख़ुदा ! ये अमानत सलामत रहे
वाह ! क्या बात आ'ला हज़रत की !
वाह ! क्या बात आ'ला हज़रत की !
कभी भी आप ने ग़ैरों के हक़ में कुछ नहीं लिखा
नबी के वास्ते था शा'इराना आ'ला हज़रत का
गिरा देते हैं गुस्ताख़-ए-नबी को इक ही हमले में
कभी ख़ाली नहीं जाता निशाना आ'ला हज़रत का
वाह ! क्या बात आ'ला हज़रत की !
वाह ! क्या बात आ'ला हज़रत की !
अहल-ए-ईमान ! तू क्यूँ परेशान है
रहबरी को तेरी कंज़ुल-ईमान है
हर क़दम पर ये तेरा निगहबान है
या ख़ुदा ! ये अमानत सलामत रहे
वो जीती-जागती तस्वीर थे तक़्वा, तहारत के
था किर्दार-ए-मुक़द्दस सूफ़ियाना आ'ला हज़रत का
कोई है मुफ़्ती-ए-आ'ज़म, कोई ताजु-श्शरी'आ है
अलग है ओर घरानों से घराना आ'ला हज़रत का
वाह ! क्या बात आ'ला हज़रत की !
वाह ! क्या बात आ'ला हज़रत की !
ना'रा फ़ैज़-ए-रज़ा का लगाते रहो
मुन्किरों के दिलों को जलाते रहो
और कलाम-ए-रज़ा तुम सुनाते रहो
फ़ैज़-ए-अहमद-रज़ा ता-क़यामत रहे
नबी के नाम का सदक़ा लुटाते हैं वो रोज़ाना
मगर होता नहीं है कम ख़ज़ाना आ'ला हज़रत का
रसूल-ए-पाक के गुस्ताख़ से थी दुश्मनी उन की
था 'उश्शाक़-ए-नबी से दोस्ताना आ'ला हज़रत का
मैं नाज़ाँ हूँ कि, ए 'आसिम ! दयार-ए-आ'ला-हज़रत में
बि-हम्दिल्लाह ! लिखा मैं ने फ़साना आ'ला हज़रत का
वाह ! क्या बात आ'ला हज़रत की !
वाह ! क्या बात आ'ला हज़रत की !
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